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अब तक इस टैक्स सिस्टम को अपना नहीं पाए हैं कारोबारी

नई दिल्ली

गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) को लागू हुए एक साल हो गया है लेकिन अभी कारोबारी इसे पूरी तरह नहीं अपना पाए हैं। इसकी वजह यह है कि जीएसटी का स्ट्रक्चर काफी जटिल है और इसमें टैक्स स्लैब बहुत ज्यादा। जीएसटी का टैक्स स्लैब जीरो, 3 फीसदी (गोल्ड), 5 फीसदी, 12 फीसदी और 28 फीसदी है। इसके ऊपर सेस अलग से।

एक जुलाई 2017 को जब जीएसटी लागू हुआ था तो सबसे बड़ी दिक्कत छोटे कारोबारियों की रही। इन कारोबारियों को जीएसटी की वजह से न सिर्फ काफी हिसाब-किताब रखना पड़ता है बल्कि इनपुट क्रेडिट के लिए हर महीने रिटर्न भी भरना पड़ता है। इसमें इन्हें काफी मुश्किल आती है। दूसरी तरफ 28 फीसदी के जीएसटी स्लैब से भी कारोबारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। 50 लग्जरी प्रोडक्ट्स और तंबाकू, गुटखा जैसे सिन प्रोडक्ट्स पर 28 फीसदी जीएसटी लगता है। इनमें बीड़ी, पान मसाला, सनस्क्रीन, वॉलपेपर, सेरेमिक टाइल्स, वाटर हीटर, डिशवॉशर, वेइंग मशीन, वॉशिंग मशीन, एटीएम वेंडिंग मशीन, वैक्यूम क्लीनर, ऑटोमोबाइल्स, मोटरसाइकिल आती हैं। इसके अलावा रेस क्लब, बेटिंग और सिनेमा पर 28 फीसदी जीएसटी लगता है। 28 फीसदी जीएसटी के बारे में चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर अरविंद सुब्रमण्यम का भी कहना है कि 28 फीसदी के टैक्स स्लैब को खत्म कर देना चाहिए। उनका कहना है कि ज्यादा से ज्यादा कारोबारी जीएसटी को अपनाएं, इसलिए इसे आसान बनाना जरूरी है।

सब कुछ है ग्राहक की मर्जी पर

जीएसटी की जटिलता का अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि एक साल पूरा होने के बाद भी कारोबारी इससे बचने की जुगत बना रहे हैं। दिल्ली के सबसे पुराने बाजार चांदनी चैक की बात करें तो वहां बहुत कम ऐसे कारोबारी हैं जो जीएसटी की चोरी ना करते हों। तरीका बिल्कुल सामान्य है- कच्चा बिल या पक्का बिल। कच्चा बिल यानी वो एक पन्ने पर कीमत जोड़कर आपको थमा देंगे। अगर आप पक्का बिल मांगेंगे तो वे छूटते ही कहेंगे, श्हमें क्या दिक्क्त है आप जीएसटी चुका दीजिए।श् यानी अब सबकुछ ग्राहक की मर्जी पर टिका है। इसमें बताने की कोई जरूरत ही नहीं है कि ग्राहक क्या चाहेगा। कुल मिलाकर ग्राहक सिर्फ उन्हीं प्रोडक्ट्स पर जीएसटी चुकाने के लिए तैयार होते हैं जिस पर उन्हें बिल से वारंटी लेने की जरूरत होती है।

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