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आध्यात्मिक “नर्मदा पद यात्रा’ पर है दिग्विजय सिंह

मध्य प्रदेश।

राजनीति में दिलचस्पी रखने वालों को बहुत दिन से दिग्गी राजा यानि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के अनमोल बोल सुनाई नहीं दे रहे हैं। मध्य प्रदेश से बाहर के लोगों में उत्सुकता है कि आखिर दिग्गी इन दिनों कहां हैं? क्या कर रहे हैं और सबसे बडा सवाल उनके बयान सुर्खियां क्यों नहीं बटोर रहे हैं?

दिग्गी राजा इन दिनों राजनीति से अल्पकालिक विश्राम पर हैं। वह विशुद्ध आध्यात्मिक “नर्मदा पद यात्रा’ पर हैं। कहावत है कि “चोर चोरी छोड सकता है, हेराफेरी नहीं”। इस कहावत का पूरा असर उनकी इस आध्यात्मिक यात्रा को लेकर मध्य प्रदेश की राजनीति में देखा जा रहा हैं। चूंकि इस साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, सो उनकी यात्रा के राजनीतिक निहितार्थ भी निकाले जा रहे हैं। प्रस्तुत है वरिष्ठ पत्रकार शिवमंगल सिंह की रिपोर्ट –

शहडोल। प्रदेश में चल रही एक आध्यात्मिक यात्रा इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक रंग दिखाने वाली है। इसकी बानगी गत शनिवार और रविवार को अमरकंटक में हुए राजनेताओं के जमावड़े ने दिखा दी है। ये यात्रा न केवल भाजपा के लिए भारी पड़ेगी बल्कि कई कांग्रेसी दिग्गजों के अरमानों को भी झटका दे सकती है। हम बात कर रहे हैं दिग्विजय सिंह की नर्मदा पद यात्रा की।

मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक गोटियां बहुत पहले से ही बिसात पर बैठाई जा रहीं हैं। इस बिसात पर अभी तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चालें ही सबको चित करती आ रहीं थीं, लेकिन कोलारस और मुंगावली उपचुनाव के बाद राजनीति ने कई तरह के रंग बदले हैं। तमाम राजनीतिक चर्चाओं के बीच दिग्विजय सिंह की नर्मदा यात्रा दबे पांव सियासत के अलग ही समीकरण तैयार कर रही है। एक तरफ उपचुनाव के बाद सिंधिया का कद बढऩे का दावा किया जा रहा है लेकिन दूसरी तरफ शनिवार और रविवार को अमरकंटक में जो राजनीतिक जमावड़ा हुआ वह कुछ और ही कहानी कह रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया के इलाके के ही तीन बड़े दिग्गज शनिवार को अमरकंटक में दिग्विजय सिंह की अगवानी करने के लिए मौजूद थे। इसमें लहार विधायक डॉ. गोविंद सिंह, पिछोर विधायक केपी सिंह और विजयपुर विधायक रामनिवास रावत शामिल हैं।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह और उनकी पत्नी अमृता सिंह भले ही आध्यात्मिक यात्रा पर निकले हैं लेकिन कांग्रेस नेताओं को आस है कि यह यात्रा उनका सत्ता का वनवास खत्म करेगी। इसी उम्मीद में शनिवार को बड़ी संख्या में कांग्रेस नेता जमे हुए थे। दरअसल दिग्विजय सिंह आधी से अधिक नर्मदा यात्रा पूरी करके शनिवार को ही यहां पहुंचे हैं। वे यहां दो दिन रहेंगे। उसके बाद वे आगे के लिए प्रस्थान करेंगे।

दिग्विजय सिंह ने 30 सितंबर यानि विजयादशमी के दिन बरमान घाट नरसिंहपुर से अपनी नर्मदा यात्रा शुरू की थी। लगभग डेढ़ हजार किमी की यात्रा पूरी करके वे शनिवार को अमरकंटक पहुंचे हैं। जैसे ही कोई नर्मदा यात्रा कर रहे दिग्विजय सिंह से मिलने, उनका स्वागत करने के लिए जाता है वैसे ही स्वयंसेवक एक उसे पर्चा थमा देता है। उस पर्चे की पहली ही लाइन है कि ” मेरी ये यात्रा आध्यात्मिक है, इसे राजनीतिक न बनाएं।”  परिक्रमा के दौरान किसी तरह की राजनीतिक नारेबाजी न करें, और भी कई तरह के निर्देश हैं। शनिवार को जैसे ही दिग्विजय सिंह अमरकंटक स्थित कपिलधारा पहुंचे, वहां उनका जोरदार स्वागत किया गया। वहां चंद मिनट आराम करने के बाद दिग्विजय सिंह फिर अपनी यात्रा पर निकल पड़े। कपिलधारा से उन्हें कल्याणिका आश्रम पहुंचना था। दोनों के बीच लगभग छह किमी का फासला है। इस दौरान  पूरे रास्ते का नजारा काबिलेगौर था। अमरकंटक में दिग्विजय सिंह की अगवानी करने के लिए बड़ी संख्या में कांग्रेस के नेता पहुंचे हुए थे। लेकिन दिग्विजय सिंह इस यात्रा के दौरान हर आम-ओ-खास से मिल रहे थे। बहुत लोगों ने उनके पैर छूने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। इसी बीच एक पीपल के पेड़ के नीचे अल्प विश्राम की व्यवस्था की गई थी। तीन कुर्सियां डाली गईं। इन कुर्सियों पर दिग्विजय सिंह, अमृता सिंह और कांग्रेस के वयोवृद्ध नेता रामेश्वर नीखरा बैठे। बाकी लोग इन तीनों के आसपास जमीन पर खेत में ही बैठ गए। अमरकंटक में दिग्विजय सिंह की अगुआई करने के लिए जो

नर्मदा पद यात्रा में दिग्विजय सिंह

नेता पहुंचे थे उनमें लहार विधायक गोविंद सिंह, पिछोर विधायक केपी सिंह, विजयपुर विधायक रामनिवास रावत, ब्यौहारी विधायक रामपाल सिंह, पुष्पराजगढ़ विधायक फुन्देलाल सिंह, रीवा से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राजेंद्र शर्मा, उमरिया से वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजय सिंह, नपा चुनाव के दौरान शहडोल से बागी हुए रविंद्र तिवारी भी पहुंचे हुए थे। ़

इस दौरान बातचीत में कांग्रेस नेताओं ने बताया कि ग्रामीण एरिया में यात्रा को हाथोहाथ लिया गया है। उमरिया से वरिष्ठ नेता अजय सिंह ने कहा कि दावा कोई करे लेकिन मध्यप्रदेश में आज भी दिग्विजय सिंह की बराबरी नहीं है और ये यात्रा आज भले ही आध्यात्मिक है लेकिन हम लोगों को इसका बड़ा लाभ मिलने जा रहा है। ब्यौहारी विधायक रामपाल सिंह का कहना था कि हमें इस यात्रा से काफी उम्मीदें हैं। इस यात्रा ने एक हलचल तो पैदा की ही है।

कटारे को जिताने सिंह-सिंधिया आए थे साथ

शंलहार से विधायक डॉ. गोविन्द सिंह कांग्रेस में दिग्विजय सिंह खेमे के माने जाते हैं। दिग्विजय सिंह सरकार में वे मंत्री भी रह चुके हैं। नेता प्रतिपक्ष सत्देव कटारे के निधन से खाली हुई अटेर सीट पर वर्ष २०१७ में उपचुनाव हुए थे। कटारे सिंधिया खेमे के माने जाते रहे हैं। उस उपचुनाव में सत्यदेव कटारे के बेटे हेमंत कटारे को जिताने के लिए दोनों नेता एक मंच पर आ गए थे। इसका असर ये हुआ था कि काफी कड़े मुकाबले में हेमंत कटारे को वहां जीत मिली थी और भाजपा प्रत्याशी अरबिंद भदौरिया वहां से चुनाव हार गए थे। लेकिन उपचुनाव में मुकाबला भाजपा से था। अब मामला कांग्रेस का अंदरूनी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के बीच यदि दिग्विजय सिंह भारी पड़ते हैं तो निश्चित रूप से चंबल के ये तीनों विधायक सिंधिया के साथ जाने की बजाय दिग्विजय सिंह के साथ होंगे। ऐसी स्थिति में राजनीति अपना अलग रंग दिखाएगी।

अभी तो आधी यात्रा है बाकी

दिग्विजय सिंह ने शनिवार को अमरकंटक पहुंचकर आधी यात्रा कर ली है। यानि वे नर्मदा के एक तरफ के तट पर बसे गांवों के निवासियों से मिल चुके हैं। अब सोमवार से वे नर्मदा के दूसरे तट की यात्रा शुरू करेंगे। ये यात्रा नरसिंहपुर के बरमानघाट पर खत्म होगी।

मुद्दों की होगी भरमार

लगभग 3300 किमी की यात्रा करने के बाद दिग्विजय सिंह के पास मुद्दों की भरमार होगी। दिग्विजय सिंह और अमृता सिंह इस यात्रा के दौरान हर आम और खास आदमी से मुलाकात कर रहे हैं। उनकी बात भी सुन रहे हैं। लोग बड़ी सख्या में उनके पास पहुंच भी रहे हैं। उन्होंन ेनर्मदा में हो रहे अवैध खनन से लेकर हर छोटी बड़ी बात बता रहे हैं। ऐसी स्थिति में जब २०१८ का विधानसभा चुनाव होगा, उस वक्त दिग्विजय सिंह के पास मुद्दों की भरमार रहेगी। ऐसी स्थिति में भाजपा को उनके सवालों का जवाब देना भारी पड़ सकता है।

भाजपा को बदलनी पड़ सकती है रणनीति

भारतीय जनता पार्टी को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। अभी भाजपा सिंधिया को भारी मानकर चल रही थी, लेकिन नर्मदा यात्रा से जिस तरह से समीकरण बदल रहे हैं, भाजपा को भी नए सिरे से अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। २०१८ के चुनाव में भाजपा को सिंधिया के हिसाब से नहीं बल्कि दिग्विजय सिंह के हिसाब से रणनीति बनानी पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में भाजपा के रणनीतिकारों को सारा सरंजाम फिर से जुटाना पड़ेगा।

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