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कांग्रेस ने बसपा से लिया बैर मोल

नई दिल्ली।

राजनीतिक बियाबान में भटक रहे उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी को गले लगा कर कांग्रेस ने बैठे-बैठाए बसपा से नाराजगी मोल ली है। इसका असर 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर उत्तर प्रदेश में बनने वाले विपक्षी गठबंधन पर भी पड़ सकता है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी कभी मायावती के खास सिपहसालार होते थे। मायावती जितनी बार मुख्यमंत्री बनीं, नसीमुद्दीन कैबिनेट में ताकतवर मंत्री के रूप में शामिल थे। स्थापनाकाल से वह बसपा कॉडर से जुडे़ रहे और निष्कासन होने तक वह पार्टी के महासचिव थे। बीते बरस हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में नसीमुद्दीन ने ना केवल दलित-मुसलिम समीकरण बनाने की कोशिश की थी बल्कि प्रत्याशियों के चयन में भी उन्ही की मुख्य भूमिका थी। टिकट के बदले प्रत्याशियों से भारी धनराशि की उगाही की गई थी। चुनाव पूर्व नोटबंदी लागू हुई तो उम्मीदवारों से उगाही गई भारी-भरकम नगदी की बैंकों से अदला-बदली भी उन्होंने करवाई थी। उम्मीदवारों से उगाहे गये फंड में भारी घपले की चर्चाओं के बीच नसीमुद्दीन सिद्दीकी और मायावती में गंभीर मतभेद हो गये थे। सिद्दीकी से बेहद खफा मायावती ने हालांकि चुनावी फंड में गोलमाल की बात खुलकर नहीं कही थी, शायद ऐसा कहना उनके लिए मुसीबत का सबब भी हो सकता था। तब उन्होंने सिद्दीकी पर पार्टी की सदस्यता राशि का हिसाब -किताब न जमा करने की बात कही थी। आखिरकार मायावती के निर्देश पर बसपा के दूसरे महासचिव सतीश मिश्रा ने नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बसपा से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। पार्टी से निष्कासन पर सिद्दीकी ने भी मायावती से समय-समय पर हुई अपनी वार्ता के टेप प्रेस को जारी कर आरोपों की बौछार की थी। बसपा से निष्कासन के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी राजनीतिक बियाबान में भटक रहे थे। उन्होंने समाजवादी पार्टी में शामिल होने की कोशिश की थी। आजम खां सरीखे सपा के कद्दावर नेताओं से उन्होंने मुलाकात भी की थीं। कुल मिलाकर उनके सपा में शामिल होने की बात पक्की भी हो चुकी थी। उन्होंने अपने साथ सपा की सदस्यता दिलाने को अपने समर्थकों की सूची भी तैयार कर ली थी। सब कुछ तय था और उनके सपा में शामिल होने की विधिवत घोषणा बीते बरस आगरा में हुए सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन में होनी थी। ऐन मौके पर सपा ने भी सिद्दीकी के लिए दरवाजे बंद कर दिए थे। राजनीतिक पंडितों का मानना था कि सिद्दीकी को पार्टी में ना शामिल कर पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दूरदर्शिता दिखाई। इससे उन्होंने मायावती को एक संदेश दे दिया कि उनका भरोसा तोडने वाले को उन्हें जरूरत नहीं है। अखिलेश का यह कदम दोनों दलों के बीच भविष्य के किसी गठबंधन होने पर सदभावना के रूप में भी देखा गया।

 

​जितेन्द्र दी​क्षित

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