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कांची पीठ : धन की कमी नहीं फिर भी हर तरफ सादगी

कांची पीठ : धन की कमी नहीं फिर भी हर तरफ सादगी

साल 2010 मैं और मेरी पत्नी चेन्नई गए. दिल्ली से सुबह सात बजे उड़कर हम वहां 10 बजे से कुछ पहले पहुँच गए. उसी दिन दोपहर हम टैक्सी कर तिरुपति पहुंचे, अगले दिन सुबह भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन कर हम शाम तक चेन्नई वापस आ गए. अगली सुबह हमने कांचीपुरम जाने का निश्चय किया. वहां जाकर हम शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती से पुनः मिलना चाहते थे. इसके पहले हम उनसे हरिद्वार में मिले थे और एक लम्बी वार्ता हुई थी. हम कांचीपुरम जाने के लिए एक टैक्सी में बैठे और निकल पड़े. रास्ते में श्रीपेरंबुदूर पड़ा. वहां पर प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का स्मृतिस्थल देखा. उस परिसर में घूमते हुए हमारे आँसू लगातार निकल रहे थे. एक भोले-भाले प्रधानमंत्री को मारने के वास्ते जिस तरह का विस्फोट वहां किया गया था, उसे याद कर दुःख, गुस्सा और घृणा होनी स्वाभाविक है. करीब एक घंटा वहां रुक कर हम आगे को चल दिए. यहाँ कुछ मदरासी स्त्रियों ने बताया कि राजीव गाँधी शंकर थे, मगर जब वे श्रीपेरंबुदूर में रैली करने आए तो पार्वती (सोनिया गाँधी) उनके साथ नहीं थीं. सोनिया होतीं तो शायद वे बच जाते क्योंकि पार्वती कभी शिव का नुकसान नहीं होने देतीं. भले वे पूर्वजन्म की दक्ष पुत्री सती रही हों या हिम पुत्री पार्वती. सुन्दर थी उनकी व्याख्या और भला लगा उनका विश्वास. दोपहर तक हम कांचीपुरम पहुँच गए. वहां हम पहले छोटे शंकराचार्य श्री विजयेन्द्र सरस्वती से मिले, फिर जयेंद्र सरस्वती से हमें मिलवाया गया. वे योग्य थे, तपस्वी और निरहंकारी भी. उनके आश्रम में भी सादगी थी. जबकि आश्रम के पास खूब धन है, लेकिन स्वामी जयेंद्र सरस्वती उस धन का उपयोग जन हितार्थ किया. चेन्नई का शंकर नेत्रालय और एक विश्वविद्यालय भी यही कांची कामकोटि मठ चलाता है. आश्रम द्वारा संचालित सारी संस्थाओं में आश्रम का कोई दखल नहीं है. यह स्वामी जयेंद्र सरस्वती की विशालता थी. जब हम वहां गए तो पहले तो हमें भोजन कराया गया, चावल और रसम के साथ. स्वामी जी पर आश्रम के ही एक कर्मचारी शंकर रामन की हत्या की साज़िश रचने का आरोप था और इस वज़ह से उन्हें कुछ महीने जेल में भी बिताने पड़े थे, पर जनमत उन्हें इस हत्याकांड में संलिप्त नहीं मानता था. स्वामी जी दुखी थे, लेकिन उनका चिंतन-मनन जारी था. वे अयोध्या का विवाद बातचीत से सुलझाने के पक्षधर थे, बाकी धर्मचर्चा भला मैं उनसे कैसे करता. मैं तो यूँ ही धर्महीन, कर्महीन और धनहीन हूँ. शंकराचार्य स्वामी जयेंद्र सरस्वती को प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति अब्दुल कलाम बहुत मानते थे. कल दोपहर उनका निधन हो गया और आज शैव परम्परा के अनुकूल उन्हें समाधिस्थ कर दिया गया. स्वामी जी की स्मृतियों को याद कर भावुक हो जाना सहज है. आश्रम से निकले तो हमने कांजीवरम की कई साड़ियाँ क्रय की. मलिकिनी को साड़ी संग्रह और साड़ी गिफ्ट करने का शौक़ है. तमिल के मशहूर साहित्यकार शंकर की बहू हमारे साथ चेन्नई से गई थीं, इसलिए साड़ियां खरीदने में मदद मिली. वहां भी साड़ियों के थोक दूकानदार मारवाड़ी थे. फिर एक और प्राचीन मन्दिर भी देखा. तमिल लोगों में भक्ति-भावना बहुत प्रबल होती है और इसी अनुपात में ब्राह्मण विरोध भी वहां अत्यंत प्रबल है. शंकर का परिवार करुणानिधि का करीबी है, उन्होंने बताया कि ब्राह्मण विरोध का मूल उत्तर विरोध है और यह मराठा शासकों के समय से शुरू हुआ. उत्तर से आए मराठाओं ने यहाँ खूब अत्याचार किए. तंजौर के नवाब लोग मराठा समर्थक थे, इसलिए यहाँ के मुसलमान ब्राह्मण परम्परा को फालो करते हैं. मसलन चन्दन लगाना, सफ़ेद मदरासी लुंगी पहनना और नंगे पाँव चलना. यहाँ के मुसलमान बिलकुल ब्राह्मण सदृश दीखते हैं. यह भी अजीब है कि तमिलनाडु में बीजेपी या कोई भी धार्मिक कट्टर राजनीतिक पार्टी नहीं है, लेकिन यहाँ का ईसाई समुदाय सबसे अधिक कट्टर है. यहाँ हिंदू आबादी 90 से 96 प्रतिशत के आसपास है.
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की एफबी वॉल से सभार।
 

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