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केवल शुल्क वसूलने का जरिया बनी मंडी समितियां

मुजफ्फरनगर ।

प्रदेश की कृषि उत्पादन मंडी समितियां अपने उद्देश्य की प्राप्ति में विफल हो गयी है । जिन किसानो के हितो के संरक्षण के लिए इन मंडियों की स्थापना हुई थी वह किसान अब इन मंडियों का रास्ता भूल गए है। मंडी समितियां सिर्फ मंडी शुल्क वसूलने की एजेंसिज बन कर रह गयी है यहां अब व्यापार संस्कृति नहीं बची है मंडियां कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहीं है। साठ के दशक में जब देश की राजनैतिक विचारधारा में साम्यवाद और समाजवादी चिंतन परवान पर था तब यह मांग पुरजोर तरिके से उठी थी कि मंडी के आढ़ती गोशाला ,धर्मादा और करदा के नाम पर किसानो से नाजायज कटौती करते है। मंडियों के व्यापार में सरकारी नियन्त्रण से इस तथाकथित लूट को रोका जा सके इसके लिए कृषि उत्पादन मंडी अधिनियम 1964 बनया गया जिसके अंतर्गत मंडियों की स्थापना हुई। बाद में एक के बाद एक नवीन मंडी स्थल बनाये गए।
मंडी समितियों के प्रशासनिक खर्चो के लिए मात्र पच्चीस पैसे का मंडी शुल्क ग्राहक पर लगया गया यही नहीं किसान जिस आढ़ती के माध्यम से अपनी फसल को बेचेगा उसके कमीशन समेत तमाम खर्चे भी ग्राहक पर थोपे गए। अधिनियम में प्रावधान था कि मंडी समितियों का संचालन नगरपालिका की तर्ज पर निर्वाचित जन प्रतिनधि करेंगे। 11 प्रतिनिधियों की इस समिति में 7 किसान व 4 व्यापारी प्रतिनिधि होंगे। पर आश्चर्य की बात यह है कि 1964 से लेकर 2018 तक प्रदेश में इन मंडी समितियों के चुनाव तो दूर कभी वोटर लिस्ट भी नहीं बनी। हाँ दो बार थोड़े समय के लिए नामित समितियां जरूर आयी। मंडियों का संचालन प्रशासनिक अधिकारिओ के हाथ में ही रहने के कारण मंडिया लालफीता शाही की शिकार हो गयी। प्रशासनिक खर्च के नाम पर मंडी शुल्क पच्चीस पैसे सैकड़ा से दस गुना बढ़ाकर ढाई रुपए सैकड़ा कर दिया गया इसके साथ ही तमाम खर्चे ग्राहक पर लाद दिए। मंडी समितिओं के इन खर्चो की मार परोक्ष रूप से किसान परही पड़ी। हालाँकि सीधे तोर पर ये भारी खर्चे कहने को तो माल की खरीद करने वालो पर थे पर इसका खमियाजा किसान को ही भुगतना पड़ा। मसलन मंडी में कोई किसान अपना एक कुंतल गुड़ 3000 रुपए में बेचता है तो इस पर 75 रुपए मंडी शुल्क और 45 रुपए आढ़त यानि 120 रुपए कुंतल ग्राहक को और देना होगा।
मंडी के इन बढ़ते खर्चो ने मंडियों की चमक खत्म कर दी। किसानो ने अपनी फसल मंडी के बाहर बेचने में अपनी भलाई समझी ,ग्राहक को भी इसका फायदा पहुंचा। आकंठ भ्र्ष्टाचार में डूबा मंडी प्रशासन और मंडी शुल्क की चोरी करने वाले व्यापारिओं में दुरभि संधि हो गयी। कृषि जिंसों का व्यापार मंडी स्थलों से बाहर निकल गया। प्रदेश में सामान्तर मंडियां विकसित हो गयी। सुने पड़े मंडी स्थलों की सड़को पर लोग कार चलना सीख रहे है या तो बच्चे क्रिकेट खेल रहे है।
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