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जितेंद्र दीक्षित को श्रद्धांजलि संदेशों से अटा पड़ा सोशल मीडिया, शशि शेखर, शम्भूनाथ शुक्ल समेत तमाम दिग्गज पत्रकारों ने याद किया

वरिष्ठ पत्रकार व ‘असल बात’ न्यूज पोर्टल के संपादक रहे जितेंद्र दीक्षित का यूं चले जाना उनके शुभचिंतकों के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं। उनके निधन की जानकारी मिलने के बाद बृहस्पतिवार से ही जिन्होंने कभी उनके साथ काम किया था, वे अब हर उन क्षणों को याद कर रहे हैं, जो उनके साथ बिताया था। उन्हें अंतिम विदायी देने के लिए तमाम पूर्व सहयोगी और वरिष्ठ जनों के शब्दांजलि से सोशल मीडिया अटा पड़ा है। दैनिक हिंदुस्तान अखबार के प्रधान संपादक शशि शेखर, अमर उजाला के पूर्व संपादक शंभूनाथ शुक्ल समेत देश भर से कई पुराने साथियों ने सोशल मीडिया पर दीक्षित जी के साथ बिताए दिनों की यादें साझा की और अपनी श्रद्धांजलि दी।

शशि शेखर ने लिखा...

आप चले गए जितेंद्र दीक्षित !

जितेंद्र दीक्षित नहीं रहे । वे ‘अमर उजाला ‘ में मेरे सहयोगी थे । नगर संवाददाताओं की बैठक के बाद जब मुख्य कार्यालय पहुँचता तो वे बैठे मिलते, समूचे सम्पादकीय में अकेले । उनकी कमर में दिक़्क़त थी , मुझे देखकर वे सम्मानवश उठने की कोशिश करते तो मैं कुछ स्नेह और तमाम सहानुभूति के साथ न उठने का इसरार करता पर वे कभी मानते तो कभी नहीं मानते ।विनम्रता उनके स्वभाव में थी ।

मैं मेरठ कभी रहा नहीं था और इस नाते एक समझदार शख़्स की तलाश थी जो ज़रूरी होने पर मुझे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की बारीकियों को समझा सके , जितेंद्र जी ने इस ज़िम्मेदारी को ख़ुद ब ख़ुद उठा लिया था । वे हर हफ़्ते मेरा कालम टाइप करने लगे थे और मैं कीबोर्ड पर उनकी अंगुलियों की तेज़ थिरकन देख मुग्ध हुआ जाता । तेज़ पंचिंग के बावजूद वे न्यूनतम ग़लतियाँ करते और जब प्रूफ़ मेरे पास भिजवाते तो मुझे सिर्फ़ अपनी अपनी भाषा और विचारों को हल्का सा सुधारना होता । वे वाक़ई मददगार थे ।

शुरू में मैं उनके व्यवहार में झिझक और एक तरह की आशंका पाता । धीमे – धीमे वे बरसों से बंद पड़ी कोठरी की भाँति खुलते गए । कुछ पूछता अथवा वे ख़ुद बताना चाहते तो उनके चेहरे पर मोहिनी मुस्कान पहले से तैर रही होती । उन्हें देख एक शेर अक्सर याद आता – बाहर जो देखते हैं , वो समझेंगे किस तरह , कितने ग़मों की भीड़ है इस आदमी के साथ ।

बरसों से दीक्षित जी से मुलाक़ात नहीं हुई थी पर उनकी मुस्कान कभी विस्मृत नहीं हुई । वे याददाश्त के trashbox के लिए नहीं बने थे । उम्मीद है , मौत को देख भी वे मुसकाए होंगे ।जिजीविषासम्पन्न लोग ऐसे ही जीते और मरते हैं ।

शंभूनाथ शुक्ल ने लिखा…

आज निजी व्यस्तताओं की वजह से फ़ेसबुक पर नहीं जा पाया, शाम को कानपुर से सुनील मिश्र का फ़ोन आया कि जितेंद्र दीक्षित नहीं रहे। मैं तो सन्न रह गया। जिस आदमी की जीवटता, जीवंतता और जीवन के प्रति जिजीविषा प्रेरणास्रोत थी, वह यूँ चल देगा।
मेरा उनसे परिचय तब हुआ, जब साल 2011 में मैं मेरठ में अमर उजाला में संपादक बन कर गया। तब वे वॉकर के सहारे आते और लंबा समय आफिस को देते। मगर पग-पग चलना उनके लिए मुश्किल था। इसलिए मैने अमर उजाला के एमडी से यह अनुशंसा की कि उनका प्रमोशन कर दिया जाए और उन्हें घर से ही काम करने की छूट दी जाए। एमडी साहब ने मेरा यह सुझाव स्वीकार कर लिया गया। उन्होंने रिटायरमेंट तक घर से काम किया और पूरे निष्ठाभाव से। मैं जब मेरठ से विदा हुआ, तब वे वॉकर के सहारे मिलने घर आए थे। फिर वे रिटायर होकर मुज़फ़्फ़र नगर बस गए। मैं पिछले साल मई में उनसे मिलने गया था, तब से बस फ़ेसबुक पर मिलते थे। आज उनके निधन की सूचना से स्तब्ध रह गया। लगता है अपना सगा छोटा भाई खो दिया। अश्रुपूरित श्रद्धांजलि जितेंद्र दीक्षित जी को।

जयपुर (राजस्थान) से विनोद पाठक ने लिखा-

विश्वास नहीं हो रहा दीक्षित जी चले गए
बात साल 2001 की है। मैं अमर उजाला में ट्रेनी था। गाजियाबाद, बुलंदशहर और खुर्जा होता हुआ मेरठ पहुंचा था। अभी कुछ महीने हुए थे। एक दिन ऑफिस में खलबली मची। जितेंद्र दीक्षित जी का मेरठ ट्रांसफर हो गया है। मेरा तब तक दीक्षित जी से परिचय नहीं था। इतना सुना था कि तेज-तर्रार पत्रकार हैं। ऑफिस की खलबली से ये तो पता चल गया था कि वो छोटी-मोटी शख्सियत तो नहीं हैं। वो और हम कब परिवार का हिस्सा बन गए, पता नहीं चला। उस समय मेरा विवाह नहीं हुआ था। दीक्षित जी के घर पत्रकारों की लगभग रोजाना बैठकें लगा करती थीं। चाय-नाश्ते के दौर तो चलते ही थे, दो-चार लोग रोजाना उनके घर भोजन करते।
दीक्षित जी अर्थराइटिस रोग से पीड़ित थे। उन्हें चलने-फिरने में तकलीफ थी। पर किसी के सुख-दुख में वो कभी रुके नहीं। मैं साल 2003 में मेरठ से दिल्ली आ गया, लेकिन हमारी दूरियां कम नहीं हुईं। अक्सर फोन पर बातचीत होती। जब भी मैं मेरठ जाता, उनसे मिलता जरूर। उम्र में दीक्षित जी मुझसे काफी बड़े थे, लेकिन बड़े भाई की तरह उनका स्नेह सदैव मुझे मिलता। दीक्षित जी के छोटे दामाद मेरे परममित्र शेषमणि शुक्ला हैं। एक दिन दीक्षित जी का फोन आया, बोले- विनोद जी प्रिंसी के लिए शेष जी ठीक रहेंगे। मैं तपाक से बोला- भाई साहब इससे अच्छा वर तो मिल ही नहीं सकता। (शेष जी के लिए मैं इतना ही बोल सकता हूं, उनके जैसा व्यक्ति लाखों में एक होता है)
दीक्षित जी से जुड़ी इतनी यादें हैं कि किताब लिखी जा सकती है। लेकिन, दो-तीन संस्मरण आंखों के आगे तैर रहे हैं। मेरे ससुर जी भारत भूषण शर्मा जी से भी दीक्षित जी का बहुत स्नेह था। ससुर जी हर वर्ष मेरठ की कुछ शख्सियतों को पुरस्कार देते हैं। एक दिन उनका फोन आया। बोले- पत्रकारिता के लिए हम दीक्षित जी को सम्मानित करना चाहते हैं। आप एक बार उनकी सहमति ले लो। उस समय दीक्षित जी अमर उजाला में सेवारत थे। मैंने बात की तो बोले- इससे अच्छा तो कुछ हो नहीं सकता। पर, ऑफिस की कुछ मजबूरी ऐसी थीं कि उन्होंने पुरस्कार लेने में असमर्थता जताई। अभी एक सप्ताह पहले उनसे बात हो रही थी, बोले- विनोद जी आपके ससुर जी वो पुरस्कार अब भी दे रहे हैं? मैंने कहा, हां। बोले- अब मैं रिटायर हो गया हूं। अब मुझे कोई परेशानी नहीं हैं। मैं पुरस्कार ले लूंगा। मैंने उनसे बात करने के बाद तुरंत ससुर जी से बात की और वो सहर्ष तैयार हो गए।
दीक्षित जी की लगभग हर विषय पर जबर्दस्त पकड़ थी। राजनीतिक और सामाजिक विषयों के वो मास्टर थे। जब भी कुछ समझना होता, उन्हें फोन लगा लेता था। ऐसा कभी नहीं हुआ कि फोन न उठा हो। उन्हें लंबी चर्चाओं में मजा आता था। शारीरिक तकलीफों के बावजूद उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा। रिटायरमेंट के बाद वो मेरठ से मुजफ्फरनगर शिफ्ट हो गए थे। अक्सर फेसबुक पर उनकी पोस्ट पढ़ने को मिलती रहती थीं। उनसे मिलने आने वालों का तांता लगा रहता था। मैंने प्लान किया था कि इस बार जब भी मेरठ जाऊंगा तो भाई साहब से मिलने मुजफ्फरनगर जाऊंगा।
अभी कुछ दिनों पहले उन्हें असल बात नाम से न्यूज पोर्टल भी शुरू किया। वाट्सएप पर उनके निरंतर मैसेज आते थे। एक ग्रुप भी बन गया था। असल बात को लेकर मेरी पुनः दीक्षित जी से बातचीत होने लगी थी। पिछले दो सप्ताह से करीब-करीब रोजाना बातचीत हो रही थी। मैंने जब कहा, भाई साहब राजस्थान की खबरें तो मैं दे दिया करूंगा, वो खुश हो गए। असल बात को लेकर वो बेहद उत्साहित थे। बोले- आप मुझे वाट्सएप कर दिया करना। असल बात पर चर्चा हुई तो बोले- सेक्शन तो बहुत बना रखे हैं। जब मैंने कहा, भाई साहब बॉलीवुड और खेल भी मेरे जिम्मे रहा। वो तुरंत बोले, विनोद जी मजा ही आ जाएगा। असल बात को लेकर उनका जोश वाकई काबिले तारीफ था। जैसे नए स्टार्ट अप को लेकर कोई चिरयुवा उत्साहित होता है। एक सप्ताह पहले मैंने उन्हें बताया कि भाई साहब जयपुर में फ्लैट खरीद लिया है। बहुत खुश हो गए, बोले- विनोद जी आप बहुत परिश्रमी हो।
दीक्षित जी ने लंबा शारीरिक कष्ट झेला, पर कभी उनके चेहरे पर शिकन नहीं देखी। भाभी जी को आंखों की तकलीफ है। वो भाई साहब के साथ हर सुख-दुख में साथ रहीं। दोनों की बहुत सुंदर जोड़ी थी। दीक्षित एकाएक चले गए। मुझे अब भी विश्वास नहीं हो रहा। मैंने एक शुभचिंतक, मार्गदर्शक, बड़ा भाई खो दिया।
भाई साहब आप सदैव मेरे दिल में रहोगे….

खंडवा (मध्य प्रदेश) से विजय गुप्ता ने लिखा-

अमर उजाला के सेवानिवृत्त पत्रकार, वेब पोर्टल “असल बात” के संपादक और मेरे प्रेरणास्रोत श्री जितेंद्र दीक्षित जी के निधन का समाचार सुनकर स्तब्ध हूँ।
दो वर्ष पूर्व सोशल मीडिया के माध्यम से जब आपसे संपर्क हुआ था, उस समय मैं आईसीआईसीआई बैंक (दिल्ली) में नौकरी करता था। परंतु कुछ समय पश्चात किसी कारणवश जब मेरी नौकरी चली गई तो मैंने एक साप्ताहिक अखबार में काम शुरू किया, उसी समय मेरी आपसे निकटता बढ़ी। मैं अक्सर आपके आलेख पढ़ता और उनसे प्रेरणा पाकर स्वयं भी कुछ न कुछ लिखने का प्रयास करता। आपसे जब भी बातें होती तो देश की राजनीति, अर्थव्यवस्था और अन्य तात्कालिक मुद्दों पर हमारी लंबी चर्चा चलती। पत्रकारिता के प्रति आपका समर्पण, निष्पक्षता और आपकी लेखन-शैली का मैं कायल रहा। अमर उजाला से सेवानिवृत्त होने के पश्चात आपने अस्वस्थ होते हुए भी जिस तरीके से अपना वेब पोर्टल “असल बात” के नाम से शुरू किया था और जिस तरीके से आप अपने स्तर से खबरों की जाँच-पड़ताल कर उन्हें पेश करते थे, उससे यही लगता था कि आपका वेब पोर्टल “असल बात” बहुत जल्द ऊँचाइयों पर जाएगा। आपसे पत्रकारिता से संबंधित बहुत कुछ सीखा और आगे भी बहुत कुछ सीखना था। परंतु असल बात ये थी कि विधाता को यही स्वीकार था, उन्होंने आपको अपने पास बुला लिया।
अभी एक माह पहले आपसे फोन पर लंबी वार्तालाप हुई थी, जिसमें आपने अपनी समस्याओं के बारे में बताया था और मेरी समस्याओं से भी अवगत हुए थे। आपकी उस कष्टकारी बीमारी (जोड़ों में भयंकर दर्द) के बारे में काफी विस्तार से चर्चा चली थी। आपसे बातें करते हुए कभी ऐसा लगता नहीं था कि लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति से बातें हो रही है। कल रात्रि को हृदय-गति रुकने के कारण आप इस संसार को छोड़कर चले गए।
मेरे लिए आपके द्वारा कही हुई एक बात आज मेरे मन-मस्तिष्क में गूँज रही है, “विजय जी ! इस आभासी मंच पर आपकी मित्रता एक सुखद एहसास की तरह है।”
ईश्वर से कामना है कि वो आपको अपनी गोद में स्थान दें और आपके पीड़ित परिवार को इस दु:ख को सहने की शक्ति दें।

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