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ट्राइबल्स बनाम बंगाली सेंटिमेंट्स हमेशा नाजुक मसला रहा है त्रिपुरा में !

अगरतला (धीरेश सैनी) 
नैशनल मीडिया में नदारद रहने वाला उत्तर पूर्व का छोटा सा राज्य त्रिपुरा आज सबसे ज्यादा सुर्खियों में है। इसकी वजह वहां लंबे समय से चले आ रही मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार का पतन और मोदी-शाह के नेतृत्व में यहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अभूतपूर्व जीत है। इस राज्य में बीजेपी-आईपीएफटी गठबंधन की सरकार का गठन अब महज औपचारिकता भर की दूरी पर है। अगर कुछ अप्रत्याशित नहीं होता है तो बिप्लब देब त्रिपुरा के नए मुख्यमंत्री होंगे। उत्तर-पूर्व में भाजपा की जीत के सूत्रधार की तरह देखे जा रहे भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव (जो भाजपा से आने से पहले संघ के प्रवक्ता भी रह चुके हैं) ने कहा कि मुख्यमंत्री पद पर नाम तय करने के लिए आज शाम भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक होगी।
बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव और त्रिपुरा के बीजेपी राज्य अध्यक्ष व प्रभारी सुनील देवधर ने अगरतला में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि हमें राज्य की जनता ने भारी जीत के रूप में आशीर्वाद दिया है। इस जीत की चमक पूरे देश में महसूस की जा रही है। हमें विश्वास है कि हम त्रिपुरा को स्थायी सरकार देंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी को सत्ता में लाने के लिए कड़ी मेहनत की। हम उनके और दूसरे केंद्रीय मंत्रियों व नेताओं के आभारी हैं। त्रिपुरा के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि चुनावी अभियान के दौरान माकपा ने उनकी पार्टी के 11 कार्यकर्ताओं की हत्या की लेकिन जनता ने विचलित हुए बिना बीजेपी-आईपीएफटी के समर्थन में स्पष्ट बहुमत दिया है।
उन्होंने कहा कि हम हिंसा में विश्वास नहीं रखते हैं। चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद हिंसा नहीं होनी चाहिए। हम उम्मीद करते हैं कि पुलिस किसी भी तरह की हिंसा नहीं होने देगी। गौरतलब है कि त्रिपुरा में चुनाव नतीजे घोषित होने के बाद हिंसा होती रही है।
बीजेपी की यह जीत इस लिए भी गौरतलब है कि पिछले विधानसभा चुनाव तक त्रिपुरा में उसकी कोई चुनावी हैसियत नहीं थी। उसे इस राज्य में कभी दो फीसदी वोट भी नसीब नहीं हो पाए थे। हालांकि, आरएसएस की वहां मजबूत स्थिति थी जो भाजपा की जीत का मुख्य आधार रहता आया है। इसके बावजूद बीजेपी को इस राज्य में अपनी पकड़ बनाने के लिए गैरबीजेपी नेताओं को अपनाना पड़ा।
त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री के बेटे व कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सुदीप बर्मन समेत कई प्रमुख कांग्रेस नेता और विधायक सीधे या टीएमसी होते हुए बीजेपी में शामिल हुए। ट्राइबल इलाकों में आईपीएफटी के साथ बीजेपी का गठबंधन इस जीत के लिए माहौल बनाने में मददगार रहा। गौरतलब है कि इस राज्य में ट्राइबल्स बनाम बंगाली सेंटिमेंट्स हमेशा नाजुक मसला रहा है। ट्राइबल्स को लगता है कि पहले अंग्रेजों के साथ और बाद में भारत विभाजन के दौरान त्रिपुरा में आए बंगाली उनके शोषक रहे हैं और सांस्कृतिक रूप से भी हावी होते रहे हैं। इन्ही सेंटिमेंट्स के चलते यह राज्य आंतकवाद का खौफनाक दौर भी देख चुका है जिसे खत्म कर शांतिपूर्ण माहौल बनाने का श्रेय माकपा की एक के बाद एक कई जीत की बड़ी वजह रही है।
माणिक सरकार अपने लंबे भाषणों में संत्रासवाद (आतंकवाद) के उस दौर को याद भी दिलाते रहे हैं। उस दौर के बाद पैदा होकर बड़ी हुई पीढ़ी के लिए ये भाषण बेअसर रहे। दिलचस्प यह भी है कि शहरी इलीट बंगाली समाज और अलगाववादी ट्राइबल संगठनों के विरोध के बावजूद आम गरीब-ग्रामीण बंगाली और आम ट्राइबल माकपा को ही वोट देता रहा था। इस बार बीजेपी-आईपीएफटी अलायंस ने माकपा के ट्राइबल्स इलाके के आधार को चोट पहुंचाने में कामयाबी हासिल की। पिछली बार इस इलाके में 20 में से 19 सीटें पाने वाली माकपा को नकार दिया गया।
बीजेपी का आरोप है कि माकपा छोटे स्तर तक गुंडागर्दी करती थी और छोटे से छोटा काम उनके स्थानीय प्रतिनिधियों के जरिये ही मुमकिन होता था। बदले में माकपा को वोट देना लोगों की मजबूरी हो जाता था। यह भी गौरतलब है कि भाजपा ने जीत के साथ ही माकपा पर अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का आरोप लगाया है जबकि माकपा का कहना है कि बीजेपी ने जीत हासिल करने के लिए अपार धन खर्च कर अलगाववादी संगठन को साथ लेने में गुरेज नहीं किया और लगातार हिंसा का माहौल बनाए रखा।
जहां तक माणिक सरकार की छवि का सवाल है तो वे अपने पूर्ववर्ती नृपेन चक्रवर्ती की तरह निर्विवाद रूप से ईमानदार और लेजेंड्री इमेज वाले सीएम रहे हैं। पिछली बार वाम मोर्च ने त्रिपुरा में सातवीं और लगातार पांचवी सरकार बनाई थी तो सवाल यह था कि अगली बार माणिक सरकार की जगह कौन लेगा। लेकिन इस बार जिस तरह की परिस्थितियां थीं, माणिक सरकार को ही चुनाव अभियान की अगुआई करनी पड़ी।
धानपुर विधानसभा क्षेत्र से खुद माणिक सरकार की जीत का अंतर कम हो गया। पिछली बार उनकी जीत का अंतर 6017 वोट थे जबकि इस बार वे 2224 वोटों से जीत सके। उन्हें 8859, उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी प्रतिमा भौमिक को 6635, कांग्रेस की लक्ष्मी नाग को 347 वोट मिले। कांग्रेस की यह स्थिति लगभग पूरे राज्य में है और उसका खाता नहीं खुला है। जहां तक विकास का सवाल है तो केंद्र में विरोधी सरकार होने के बावजूद त्रिपुरा की वाम मोर्चा सरकार सामाजिक सूचकांक के मसले में अव्वल जगह पाती रही है। मनरेगा से लेकर सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाओं में उसका प्रदर्शन राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर रहा है। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने एक टके (रुपया) में 35 किलो चावल मुहैया कराने जैसे वायदे किए थे। नया मध्यवर्ग औऱ नई पीढ़ी विकास के जिस मॉडल से आकर्षित रहा है, उसके दबाव की चुनौती वाम मोर्चे के सामने पहले ही थी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह, केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू और दूसरे भाजपा नेताओं ने इस जीत को विकास की जीत कहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने त्रिपुरा के विकास का ही भरोसा जताया है। लोकसभा चुनाव में देशभर में किए गए वादों की तरह त्रिपुरा विधानसभा चुनाव के दौरान किए गये वादे भाजपा किस तरह निभाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
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