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नहीं रहीं मशहूर आंबेडकरवादी चिंतक, कवयित्री रजनी तिलक

नई दिल्ली ।

मशहूर आंबेडकरवादी चिंतक, कवयित्री, स्त्री मुक्ति आंदोलन की जुझारू नेता और पत्रकार रजनी तिलक नहीं रहीं । उन्होंने शुक्रवार रात 11 बजे दिल्ली के सेंट स्टीफन्स हॉस्पिटल में आखिरी सांस ली।
रीढ़ की हड्डी में चोट की वजह से परेशानी बढ़ने के कारण उन्हें इसी सप्ताह अस्पताल ले जाया गया था। उनकी बहन और मशहूर लेखिका अनीता भारती ने तीन दिन पहले सोशल मीडिया पर जानकारी दी थी कि रजनी तिलक सेंट स्टीफन्स की आईसीयू यूनिट में भर्ती हैं। रीढ़ की हड्डी में दिक्कत की वजह से डॉक्टरों ने उन्हें गले में कॉलर लगाने की सलाह दी थी पर बाद में रीढ़ की हड्डी के ऑपरेशन के लिये कहा गया। 26 मार्च को उन्हें पैरालाइसिस अटेक हुआ। उनका ऑपरेशन हुआ जो सफल रहा। बाद में उनकी तबीयत बिगड़ती चली गई तो उनको वेंटीलेटर पर रखा गया। रजनी तिलक के निधन से साहित्य और सामाजिक न्याय के आंदोलनों से जुड़े लोगों में शोक की लहर है।

रजनी तिलक का जन्म पुरानी दिल्ली में जमामस्जिद के पास स्थित कटरा रजाराम में एक साधारण जाटव परिवार में 27 मई 1958 को हुआ था। उनके पिता दुलारे लाल टेलरिंग में पैटर्न मास्टर थे और मां जावित्री देवी कागज के लिफाफे बनाकर घर की आमदनी में मदद करती थीं। मां का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ जाने की वजह से रजनी ने अपने बड़े भाई मनोहर के साथ मिलकर बाकी पांच भाई बहनों के लालन-पालन और पढ़ाई की जिम्मेदारी संभाली। बड़े भाई मनोहर के वामपंथी रुझान के चलते वे और उनके दूसरा भाई अशोक भारती भी पहले वामपंथी आन्दोलन में सक्रिय हुए। बाद में उन्होंने आंबेडकर का रास्ता चुना। वे करीब 6 साल तक बामसेफ से जुड़ी रहीं। छात्र जीवन में ही उनकी पहचान दलित आन्दोलन व स्त्री मुक्ति आन्दोलन की जुझारू अग्रणी नेत्री के रूप में बन गई थी। उन्होंने दलित लेखक संघ की अध्यक्ष, सेंटर फॉर ऑलटरनेटिव दलित मीडिया (सीएडीएएम) की सचिव, राष्ट्रीय दलित महिला आंदोलन की संयोजिका जैसी जिम्मेदारियां निर्वाह कीं। अखिल भारतीय आंगनवाडी वर्कर्स और हेल्पर्स यूनियन, आह्वान थियेटर, नैशनल कंफेडरेशन ऑफ दलित वीमेन, वर्ल्ड डिग्निटी फोरम में उन्होंने अविस्मरणीय योगदान दिया। राष्ट्रीय महिला आयोग ने उन्हें दो बार अनुसूचित जाति की एक्सपर्ट कमेटी की सदस्य मनोनीत किया और आउटस्टैंडिंग वीमेन अचीवर अवार्ड से सम्मानित किया।
रजनी तिलक ने `अभिमूकनायक` अखबार के संपादन के साथ कई किताबें भी संपादित कीं। `सावित्री बाई फुले-पहली शिक्षिका` पुस्तक के जरिये और लंबे अभियानों के जरिये भी उन्होंने उत्तर भारत में सावित्री बाई फुले का परिचय कराने में बड़ा योगदान दिया। दो काव्य संग्रहों `पदचाप` व `हवा सी बैचैन युवतियां` और आत्मकथा के अलावा उनकी महत्वपूर्ण मौलिक व संपादित कृतियां हैं – `बुद्ध ने घर क्यों छोड़ा`, `शांताबाई दाऩी की आत्मकथा का अनुवाद `धूप-छांव`, `आत्मकथा-शांताबाई काम्बले नाज़ा`, `समकालीन दलित महिला लेखन`, `मुक्तिकामी दलित नायिकाएं`, `डॉ. अम्बेडकर और महिलाएं’` आदि। उन्होंने मराठी की पांच किताबों का हिन्दी में अनुवाद भी किया।

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