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मुजफ्फरनगर में जोगीरा सा. . रा. . रारा।

डॉ. दिलवर जानी अपने दवाखाने के तहखाने में मोबाइल स्क्रीन पर आंखे गढाए एब्रो डांस देखने में मसगूल थे। एकाएक कंधे पर किसी मुलायम हाथ का अहसास हुआ। दिलवर की बूढी हो चुकीं जवान हसरतें मचल गयीं। वह पीठ की तरफ मुडे। तांबूल की लालिमा से सज्जित उनके प्यासे होंठ फड़फड़ा उठे। पल भर में उनका रोमांश काफूर हो गया। अरे आप? मैं समझा कोई. . . । अब वह प्रो. तिवारी से मुखातिब थे। झेंपे-झेंपे से। खैर आदत के मुताबिक एब्रों डांस की बारीकियां बताने लगें। आंखें अभी भी मोबाइल स्क्रीन से हट नही पा रहीं थीं। तिवारी ने मौका गंवाए बिना महावर उडेल दिया। दिलवर हीं-हीं करने लगे। दवाखाने के बाहर ढपली बज रही थी। जोगीरा सा. . रा. . रारा।

 शहर भर में होली के हल्ले से बेखबर रालोदी नेता धर्मवीर बालियान, सुधीर भारतीय, संजय राठी, अभिषेक गुर्जर और ना जाने कौन-कौन नलके की हत्थी पर मढे पडे थे। जोर लगा के हीसा. . . हीसा। इतने में बडे चौधरी चिल्लाए। हत्थी हिलाने से पानी नहीं निकलने वाला। चौधरियों अक्ल से काम लो। रोजाना पसर में घर से निकल खालापार पहुंच जाओ। हाथ मिलाओ और सलाम करो। जमाने की मांग है ‘जान ना पहचान, खालाबाबू सलाम’। खैर चौधरियों को हिल्ला मिला और सबके सब पहुंच गये खालापार। अफसोस वहां भी कुछ हासिल न हुआ। रंग खेलने के परहेजगार लोग चौधरियों को देखते ही दडबे में दुबक गये। मायूस चौधरी डीएवी रोड से गुजर रहे थे कि सिर मुडांते ओलों की मार के मानिंद रंग भरे गुब्बारे बरसने लगे। छत से बच्चे चिल्ला रहे थे – बुरा ना मानो होली है।

जाट कालोनी में एमपी साहब का दरवार सजा था। कृषि नजर वाली दुरबीन से सर्वे के बाद डेवलपमेंट बालियान ने रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट के मुताबिक मैडम अन्नू खासी सक्रिय हो गयीं हैं। कोई शादी और तेरहवीं नहीं बचती जहां नमूदार ना होती हों। सत्यव्रत नाम का एक खासमखास बोला-अरे यह तो सबको पता है कि उनकी पिचकारी के निशाने पर एमपी साहब हैं, पर ‘असलबात’ पता करो-उनकी पीठ पर किसका हाथ है? अरे ये तो वक्त की बात है वरना उनके पास पिचकारी ही है, हमारे एमपी साहब के पास तमाम जलासे थे। बात पूरी भी नहीं हुई कि आवाज आई ‘रहन दे जलासे वाली बात करन को, नाश की जड तो जलासे ही निकले।’ चिंतन चल ही रहा था कि विधायक उमेश मलिक ने रंगों की बौछार शुरू कर दी। उनके पास रंगों भरी बोरी थी जो सहकारिता के आधार पर वसूल कर इकट्ठा की थी। रंगों की मार के बीच एमपी साहब को मुलाहिजा पेश करते हुए किसी ने कव्वाली शुरू कर दी. . . . बहुत कठिन है डगर पनघट की।

झांसी की रानी पर अरविंद भारद्वाज व रवींद्र चौधरी गिरोह ने अपने गैंग के वशिष्ठ, संजीव गोल्डी, कपिल सिकेरा, शरद गोयल आदि की मदद से विधायक कपिलदेव को दबोचकर रंग भरी हौजिया में पटक दिया। बेचारे कपिल हीं. . . हीं. . हीं करते हुए सरकते हुए पैजामे को संभाल रहे थे। हौजिया से निकल विधायक ने व्याख्यान दिया। भाइयों, बहनों और माताओं! आप लोग तो केवल होली पर ही रंग खेलते हैं पर हम तो पूरे साल रंग जमाए रहते हैं। रंग-गुलाल की बात छोडों, हमसे तो लोग मिर्ची पाउडर से भी लोग होली खेल लेते हैं। चमचे एक स्वर में जय हो-जय हो करने लगे।जोगीरा सा. . रा. . रारा।

इसी बीच दूसरे विधायक ऊंट पर सवार होकर निकले। होलिहारों ने रंग खेलने की मनुहार की पर उन्हे़ं पुरकाजी पहुंचने की जल्दबाजी थी। रास्ते में पुराने विधायक नीला झंडा थामे हांफते हुए दिखे। किसी ने कहा-हाथी पगला गया। बेचारे को बीच डगर छोड गया। विधायक जी ताना सुन रहे थे पर दुनिया की तरह उम्मीद के भरोसे झंडा थामे पैदल मार्च करते रहे। रास्ते में कीचड, रंग-गुलाल की बौछार सहते रहे। जोगीरा. . . सा. . . रा. . रा।

नगर की नयी नवेली चची की महफिल में श्रोता मंत्रमुग्ध थे। चची गा रहीं थीं-कोई जब राह न पाए, मेरे संग. . . . । मिरर वाले महिला सशक्तिकरण के नये अवतार समर्थ बाबू लाइव कवरेज में मशगूल थे। मियां गौहर सिद्दीकी ताली बजा-बजा कर दाद दे रहे थे। पं. नंदकिशोर शर्मा ने लगे हाथ पिछकारी से बौछार की। महफिल में गाना थम गया।. . . . बुरा ना मानो होली है।

गौरव स्वरूप ने जिया चौधरी के कांधे का सहारा लेते हुए मुफ्ती जुल्फिकार से जानना चाहा कि आखिर मुजफ्फरनगरियों पर उनका रंग क्यों नहीं चढता? गौरव जैन, अनिल लोहिया, दीपक, सुमित खेडा वगैरा-वगैरा अपना-अपना सिर धुनने लगे। मुफ्ती ने हांफते-हकलाते हुए गौरव की पिचकारी में ही कमी निकाल दी। जब रंग ही मिलावटी तो चढेगा खाक !

इसी बीच भागवत वाली भगवा मंडी फुल पैंट में नजर आई। आगे-आगे तिलकधारी डॉ. सुभाष शर्मा केमिकल युक्त रंगों के दुष्प्रभाव से बचने को नुस्खे बताते हुए चल रहे थे। फिलहाल वो पैदल टोली में इसलिए शामिल थे कि उन्हें लखनऊ से गाड़ी मिलने का इंतजार है।

मौके की नजाकत देख सपाई दुबक गये। दिन भर चले रंग-गुलाल के बाद थके-हारे होलिहारे “असलबात” दफ्तर पर जमा हो गये। यहां ठंडाई पान के बाद अरुण खंडेलवाल ने भंग महिमा पर सारगर्भित भाषण दिया। रंगे-पुते और जाने-पहचाने चेहरों को भी बिना टटोले ना पहचान पाने वाले सारे हुडदंगियों ने एक बार फिर पिचकारियां तान लीं।. . . जोगीरा. . सारारारा।

(बुरा ना मानो होली है।)

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