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लोकसभा चुनाव: पश्चिमांचल सेट करेगा चुनावी ट्रेंड, पहले चरण में इलाके की 8 सीटों पर मतदान आज

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(स्मृति…)
लोकसभा चुनाव के पहले चरण के लिए 11 अप्रैल को हो रहे मतदान से न केवल कई दिग्गज सियासतदां का भविष्य तय होना है, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के चुनाव का ट्रेंड भी सेट होगा। पहले चरण में राज्य की जिन 8 सीटों पर मतदान है, वे सभी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश सियासत की प्रयोगशाला माना जाता है। भाजपा इस इलाके में जाति, धर्म, संप्रदाय को सांप्रदायिकता की भट्टी में पका कर ध्रुवीकरण की चासनी बनाती है, जो उसके हिंदुत्व के एजेंडे को और स्वादिष्ट बना देता है। यहां से हिंदुत्व का प्रयोग चला तो पूरे प्रदेश में ही नहीं, देश में इसका रेफलेक्शन दिखना तय है। जैसा 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद हुआ और 2014 में भाजपा राज्य की 80 में से 71 सीटें जीतने में सफल रही थी। दूसरी ओर इसी इलाके से सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल कैरान लोकसभा उपचुनाव से महागठबंधन का फारमूला ढूढ़ निकालने में सफल होते हैं और 25 साल के बाद दोनों अपनी कड़वाहट भुला कर आज रालोद के साथ मिलकर मंच साझा कर रहे हैं और इस चुनाव में भाजपा के गले की फांस बन चुके हैं।
पहले चरण में सहारनपुर और बिजनौर लोकसभा सीट पर कांग्रेस की मजबूत मौजूदगी से त्रिकोणीय मुकाबला है, बाकी सीटों पर भाजपा बनाम महागठबंधन ही दिख रहा है। ये सभी सीटें अनारक्षित हैं। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के कुछ महीने बाद ही हुए 2014 के लोकसभा चुनाव हुए थे, जिसमें सभी सीटों पर भाजपा जीती थी। हिंदुत्व के अपने आजमाए एजेंडे से भाजपा पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में छा गई थी। वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ था। यहां चले इस चुनावी ट्रेंड से मोदी लहर और प्रभावशाली बन गई थी, जिसके चलते न केवल यूपी बल्कि देश के दूसरे राज्यों में भी भाजपा ने जबरदस्त प्रदर्शन किया था। लेकिन इस बार न लहर है और न ही दंगे की आंच की ताप उतनी रह गई है। मोदी सरकार के साथ यूपी की योगी सरकार के खिलाफ हल्की-फुल्की सत्ता विरोधी लहर भी बन गई है। ऊपर से गन्ना किसानों का बकाया भुगतान नहीं होने से लोगों में नाराजगी साफ दिख रही है। सपा-बसपा-आरएलडी में गठबंधन होने से वोटों का बंटवारा भी लगभग न के बराबर रह गया है। इसके चलते कुछ वर्गों का वोट एकतरफा गठबंधन प्रत्याशी को जाता दिख रहा है। हालांकि भाजपा ने एक बार फिर यहां वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश की है। मेरठ में दो दिन पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा अली-बजरंगबली का जिक्र इस ओर साफ इशारा है। अगर मुस्लिम वोट एकतरफा किसी ओर चला तो प्रतिक्रिया में हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण कराने का प्रयास किया जाएगा। भाजपा इसी का फिर फायदा लेने की कोशिश करेगी।
महागठबंधन के चलते भाजपा की राह इस बार थोड़ी मुश्किल सी दिख रही है। पहले चरण में जिन दिग्गजों का सियासी भविष्य तय होना है, उनमें प्रमुख रूप से रालोद प्रमुख और पूर्व केंद्रीय विमानन मंत्री चौधरी अजित सिंह, पूर्व केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री और भाजपा सांसद संजीव बालियान, केंद्रीय मावन संसाधन राज्यमंत्री सत्यपाल सिंह, केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री सेवानिवृत्त जनरल वी.के, सिंह और केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा हैं। यानि तीन वर्तमान केंद्रीय मंत्री और दो पूर्व केंद्रीय मंत्री हैं तो युवा रालोद नेता जयंत चौधरी और कांग्रेस के फायर ब्रांड युवा चेहरा इमरान मसूद का भी भविष्य यह चुनाव तय करेगा। दिलचस्प नजारा मुजफ्फरनगर संसदीय सीट का है, जहां चौधरी अजित सिंह और संजीव बालियान आमने-सामने हैं। अजित सिंह महागठबंधन के उम्मीदवार हैं तो बालियान भाजपा के। चौधरी अजित के लिए यह चुनाव उनका अंतिम चुनाव मानकर देखा जा रहा है, जिसके चलते जाट बिरादरी में उनके लिए एक सिंपैथी भी नजर आ रही है।
इसके साथ ही सहारनपुर संसदीय सीट पर 2014 में भाजपा के राघव लखनपाल की राह भी इस बार आसान नहीं दिख रही है। भाजपा ने एक बार फिर उन्हीं पर भरोसा जताया है। जबकि कांग्रेस ने भी अपने पूर्व प्रत्याशी इमरान मसूद पर ही दांव खेला है। वहीं गठबंधन ने बसपा के टिकट पर यहां से फजलुर्रहमान को उतारा है। मसूद पिछली बार 65090 वोट से भाजपा से हार गए थे। उस चुनाव में सपा और बसपा अलग-अलग चुनाव मैदान में थे, इससे मुस्लिम वोटों का बंटवारा हुआ था। 2009 में यह सीट बसपा ने जीती थी और 2004 में सपा ने इसे कब्जाया था। इस बार देखना दिलचस्प रहेगा कि मुस्लिम और दलित गठबंधन के साथ जाते हैं या फिर मसूद का साथ देते हैं। इसी समीकरण पर इस सीट का परिणाम तय होगा।
कैराना संसदीय सीट गठबंधन में सपा को मिली है। पिछले साल यहां हुए उपचुनाव में यह सीट आरएलडी के टिकट पर सपा-बसपा के संयुक्त प्रत्याशी ने जीत ली थी, जबकि 2014 में यहां से भाजपा के बाबू हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की थी। हुकुम सिंह की मृत्यु के बाद उप चुनाव में उनकी बेटी मृगांका सिंह को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया था, जो हार गई थीं। 2009 में यह सीट बसपा के पास थी और 2004 में आरएलडी के कब्जे में थी। इस बार के चुनाव में भाजपा ने यहां अपने पूर्व प्रत्याशी मृगांका का टिकट काट कर अपने विधायक प्रदीप चौधरी के रूप में नया चेहरा दिया है। जबकि गठबंधन की ओर से सपा ने अपने वर्तमान सांसद तबस्सुम पर ही दांव लगाया है। आरएलडी-सपा-बसपा के साथ होने के चलते जातीय समीकरण गठबंधन के पक्ष में बनता है, लेकिन 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे की आंच की तपिश पूरी तरह ठंडी नहीं हुई है। इसके चलते ऐन वक्त पर ऊंट किस करवट बैठेगा, यह देखना होगा।
मुजफ्फरनगर संसदीय सीट पर भी कमोबेश ऐसा ही जातीय समीकरण बनता दिख रहा है। गठबंधन में यह सीट आरएलडी को मिली है। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद पहली बार पश्चिमी यूपी में जाट और मुसलमान आमने-सामने आ गए थे। भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को हवा देकर मोदी लहर में यह सीट कब्जा ली थी। लेकिन तब सपा-बसपा और आरएलडी अलग-अलग मैदान में थे। आपस में वोटों का जबरदस्त बंटवारा हुआ था। इसके पहले 2009 में यह सीट बसपा के पास थी और 2004 में यहां से सपा जीती थी। इस बार सपा-बसपा-आरएलडी साथ हैं और आरएलडी प्रमुख चौधरी अजीत सिंह खुद मैदान में हैं। भाजपा ने भी जाट प्रत्याशी और निवर्तमान सांसद संजीव बालियान पर ही दांव खेला है। जाहिर है जाट वोट बंटेगा। ऐसे में निर्भर करेगा मुस्लिम, दलित और पिछड़े वोटर गठबंधन का कितना साथ देते हैं। देखना यह भी दिलचस्प होगा कि दंगे का असर अब कितना रह गया है और जाट-मुस्लिम ‘अपने चौधरी’ का कितना साथ देते हैं।
बिजनौर संसदीय सीट गठबंधन में बसपा के खाते में गई है। बसपा के मलूक नागर यहां से गठबंधन के संयुक्त प्रत्याशी हैं और भाजपा ने अपने वर्तमान सांसद कुंवर भरतेंद्र पर ही दांव लगाया है। 2009 और 2004 में यह सीट आरएलडी ने जीती थी। यह आरएलडी की परंपरागत सीट मानी जाती है। लेकिन 2013 के दंगे के असर में यह सीट भी आरएलडी के हाथ से निकल गई थी। जाट-गूजर और मुस्लिमों के साथ दलितों का वोट नागर को एकतरफा मिला तो उनकी जीत तय है।
मेरठ संसदीय सीट पर 2009 से भाजपा काबिज है। नए परिसीमन के बाद बदले जातीय समीकरण में यह भाजपा के लिए सबसे मुफीद सीट बन चुकी है। मेरठ संसदीय सीट में हापुड़ के मिल जाने से यहां वैश्य और बाकी सामान्य वर्ग के वोटों की संख्या काफी बढ़ गई है। इसके चलते इस सीट पर भाजपा का पलड़ा भारी है। इस बार भी यहां भाजपा ने अपने वर्तमान सांसद को ही मैदान में उतारा है। जबकि गठबंधन में यह सीट बसपा को मिली है। 2004 में यह सीट बसपा ने ही जीती थी। मुस्लिम, दलित और जाट पूरी तरह से गठबंधन के साथ जाते हैं तो इस बार यहां भाजपा की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। क्योंकि कांग्रेस ने पूर्व मुख्यमंत्री बाबू बनारसी दास के बेटे हरेंद्र अग्रवाल को इस सीट पर उतारा है। हरेंद्र वैश्य वोटों का विभाजन करते दिख रहे हैं, जो भाजपा के लिए खतरे के संकेत हैं।
बागपत संसदीय सीट को परंपरागत रूप से आरएलडी का गढ़ कहा जाता है। 2009, 2004 और उससे पहले भी यह सीट आरएलडी के पास ही रहा करती थी। लेकिन 2014 के चुनाव में इसे भाजपा ने आरएलडी से छीन ली। 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के चलते आरएलडी को भारी नुकसान हुआ था। इस बार गठबंधन में यह सीट आरएलडी को ही मिली है। आरएलडी नेता जयंत चौधरी इस सीट से इस बार प्रत्याशी हैं। जबकि भाजपा अपने वर्तमान सांसद सत्यपाल सिंह को ही मैदान में उतारा है। दो जाटों के बीच वोटों का बंटवारा तय है। गठबंधन में मुस्लिम-दलित और अन्य पिछड़ों के साथ आने से फिलहाल इस सीट पर आरएलडी का पलड़ा भारी दिख रहा है।
गाजियाबाद संसदीय सीट 2009 में पहली बार बनी थी। तब से यहां भाजपा ही जीतती रही है और इस बार फिर यहां से भाजपा के ही जीतने की उम्मीद दिख रही है। हालांकि गठबंधन में यह सीट सपा को मिली है और सपा ने यहां से वैश्य को टिकट दिया है। जबकि कांग्रेस ने ब्राह्मण को प्रत्याशी बनाया है। वैश्य और ब्राह्मण परंपरागत रूप से भाजपा का वोटर माना जाता है, ऐसे में भाजपा का वोट बंटना तय है। लेकिन 2014 में भाजपा प्रत्याशी रहे जनरल वी.के. सिंह यहां से 5.5 लाख से ज्यादा मार्जिन से जीते थे और इस बार भी वही भाजपा की ओर से मैदान में हैं।
गौतमबुद्धनगर संसदीय सीट भी नए परिसीमन के बाद 2009 में ही पहली बार बनी। 2009 में इस सीट पर बसपा ने जीत दर्ज की थी और 2014 में मोदी लहर के सहारे भाजपा यहां से जीती थी। इस बार भी भाजपा ने अपने वर्तमान सांसद व केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा पर दांव खेला है। जबकि गठबंधन में यह सीट बसपा के खाते में गई है। बसपा ने यहां से सतबीर नागर को टिकट दिया और कांग्रेस ने डॉ. अरविंद को प्रत्याशी बनाया है। कांग्रेस प्रत्याशी को बाहरी बताया जा रहा है तो बसपा प्रत्याशी का गूजर बहुल इलाका जेवर में ही काफी विरोध है। नोएडा के नौकरीपेशा मतदाताओं में अभी भी भाजपा की पैठ बनी हुई है, जिसके चलते यह भाजपा के लिए सुरक्षित मानी जा रही है

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