Press "Enter" to skip to content

श्रद्धांजलि : वह और आदमखोर……

>> सने अभी दुनिया को देखना शुरू किया था,
समझना नहीं,
अगर वह दुनिया को ज़रा भी समझती
तो वह समझ जाती बलात्कारियों की चाल,
उनकी भाषा और पहनावे से
पहचान जाती उनके धर्म को
उनकी ओढ़ी हुई विनम्रता के पीछे छिपी
कट्टरता को पहचान लेती
उनके बोलते ही।

लेकिन उसने अभी दुनिया को देखना शुरू किया था,
समझना नहीं,
हाँ !
माँ का दर्द उसे समझ में आने लगा था थोड़ा-थोड़ा,
वह बटाने लगी थी माँ के हर काम में हाथ,
उसे जल्दी ही पता चल गया था,
माँ होना,
वह पशुओं की भूख को पहचानने लगी थी,
हालाँकि वह आदमी की भूख के बारे में
अभी कुछ नहीं जानती थी,
जानती तो कुछ दरिंदों की भूख का शिकार न होती।

उसने दुनिया को अभी देखना शुरू किया था,
समझना नहीं,
उसकी आँखों में कुतूहल था,
सपने थे , उमंग थी,
मासूमियत थी,
और थी नयी-नयी चीजों को जानने की जिज्ञासा,
वह जानना चाहती थी,
तितलियों के पंखों के रंगों के बारे में,
वह हिरणों के कुलांचों
पक्षियों की उड़ानों,
लहलहाती फसलों,
पेड़-पौधों के करीब पहुँच रही थी।

उसे धीरे-धीरे आभास हो रहा था
कि दुनिया बेहद खूबसूरत है,
ये नदियाँ, ये पर्वत,
ये जंगल सबकुछ बहुत सुंदर है,
मगर जंगल के आदमखोर भेड़ियों के बारे में
वह अभी अंजान थी,
इनके क्रूर किस्से सुनने और समझने की
अभी उसकी उम्र भी कहाँ थी।
जो माँ ही सुनाती उसे,
आदमखोरों के खौफ़नाक किस्से।

उसने अभी दुनिया को देखना ही तो शुरू किया था,
समझना नहीं।।

-अमित धर्मसिंह

Be First to Comment

Leave a Reply

Mission News Theme by Compete Themes.