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होली मेरठ की : जोगीरा. . सारारारा।

मेरठ।

फग्गन ताऊ आबू नाले की पटरी से डग बढाते हुए आगे सरक ही रहे थे कि छपाक की आवाज आई और पूरी काया कीचडमय हो गयी। होलिहारे जोगीरा सारारारा. . . कहते हुए नौ-दो-ग्यारह हो लिए। अरे यह क्या बदतमीजी है? होली खेलनी है तो रंग-गुलाल से. . . । ताऊ की उपदेश मिश्रित तकरीर पूरी भी नहीं हो पाई कि जवाब आया-लगता है ताऊ थारे में देश प्रेम की भावना सूख गयी है और स्वदेशी के विचार से भटक चुके हो। ताऊ भन्नाएं और हुडदंगियों के आरोप से पिंडा छुडाने को संवाद शुरू किया। कीचड से सने ताऊ पीडित से जिज्ञासु की मुद्रा में आ चुके थे। बोले भाई रंग और अबीर की बात करना क्या देश द्रोह है? हमने तो कीचड डालने को मना किया और थारे को कैसे लगा कि स्वदेशी से भटक गये हो? हुडदंगियों की तरफ से जवाब मिला कि रंग-गुलाल चीन का है। उसे खरीदने का मतलब चीन की विकास दर बढाना। दूसरी तरफ कीचड अपने शहर का और अपना है जो अपनों पर ही उछालने के लिए हैं। वैसे भी अपने योगी जी “वन डिस्ट्रिक्ट-वन प्रोडक्ट” पर जोर दे रहे हैं। मेरठ नाले -नालियों का शहर है और कीचड इसका प्रमुख उत्पाद। हुडदंगियों के जवाब में ताऊ को दम लगी और अपराधबोध से ग्रसित हो वहां से फरार होने में ही भलाई नजर आयी।

नाचना तो बस नाचना है………

घंटाघर पर घोंचूप्रसाद अपनी अधेड मंडली के संग “रंग बरसय. . . की धुन पर कमर मटकाते हुए रह-रह कर उछल-कूद रहे थे। वसंती लाल कुछ देर तक कंबोह गेट की ओट से ताकते रहे। आखिरकार उनसे रहा नहीं गया। बोले – भाई नाचना है तो ढंग में नाच ले। उछल-कूद किस बात की कर रहे? एक अधेड बोला- लगता है यह भी डार्विन की थ्योरी नहीं मानता। आखिरकार उछल-कूद तो हमारे पूर्वजों ने ही सिखाया है। वसंती लाल गुस्से में तमतमा गये। बोले -डार्विन तो 19 सदी में हुआ जबकि हमारे वेद अनादिकाल से चले आ रहे हैं। हमारे ग्रंथों में नृत्य श्रेष्ठ कर्म है पर उछलना-कूदना शास्त्र सम्मत नहीं। खैर कुछ देर को उछल-कूद थमी और इस बीच लहरे की धुन पर मुंह में रुमाल दबा कर सारे अधेड लेटायमान होकर नागिन डांस करने लगे। वसंतीलाल ने मोहनपुरी का रुख किया। सोचा पुराने अध्यक्ष जी फुर्शत में होंगेे, उन्ही के साथ भगवा होली खेलेंगे। मोहनपुरी वाले ठीहे का नजारा अजब दिखा। घर के बाहर होलिहारों की भीड पर अध्यक्ष जी पीछे वाले दरवाजे से कभी भीतर तो कभी बाहर आ-जा रहे थे। एक साथ मीडिया के दो दर्जन बंदे आ धमके। अध्यक्ष जी के मुंह पर एक दर्जन माइक सट चुके थे। सबका सवाल एक – बैक डोर वाला मामला क्या है? अध्यक्ष जी ठहरे मजे खिलाडी सो गोलगप्पे जैसा गोलमोल जवाब -समय आने पर आप खुद जान जाएंगे कि बार-बार ठीहे के बैक डोर से अंदर-बाहर आने और जाने का अभ्यास क्यों कर रहा हूं। खैर बतकही चल ही रही थी कि ढोल बजाती एक हुडदंगी टोली आती दिखी। सारे लोग बचाव की मुद्रा में आ गये. . . . ।

भ्रम होना कोई अचरज नहीं !

फुल पैंट वाले गणवेश में गुजरे जमाने के हीरो की तरह एमपी साहब कुछ दर्जन होलिहारों के संग उलझन भरी मुद्रा में नजर आए। रंगों की बौछार शुरु हुई तो किसी ने सवाल दाग दिया कि जब मैट्रों चलेगी तो टिकट कहां से मिलेंगे। एमपी साहब मैट्रों की बात तो सुन नहीं पाए पर उनकी सुई टिकट पर अटक गई। अरे टिकट तो दिल्ली से ही मिलेगा। वो भी किसी एक को। यूं तो टिकट लेने को हर कोई मुंह उठा लेता है पर एक सीट पर एक ही तो टिकट मिलेगा। सांसद जी के वचन सुन सारे हक्का-बक्का ! अरे तो क्या मैट्रो में एक ही सीट होगी? क्या कहा मैट्रों में? अरे भ्रम हो गया। हम समझे तुम चुनावी टिकट की बात पूंछ रहे। सांसद जी को भ्रम होना कोई अचरज की बात नहीं थी। सावन के. . . . हरा-हरा ही। जोगीरा. . सारारारा।

एक पंथ दो काज

डेयरी वाले ढीहे पर ठंड ई का खास इंतजाम था। नौजवानों के लिए ग्रीन और बुड्ढों के लिए व्हाइट कलर की ठंडाई परोसी जा रही थी। विधायक चाचा ग्रीन ठंड ई का गिलास पकड कर फोटो सेशन करा रहे थे। लंपटलाल माजरा नहीं समझ पा रहे थे। चचा के करीबी चम्मच से पूंछ बैठे कि आखिर चचा ढलती उम्र में ग्रीन कलर वाली क्यों पी रहे हैं? चम्मच बोला-तुम नहीं समझोगे। हाथी के दांत दिखाने के और तथा खाने के और होते हैं। फोटो ग्रीन कलर के साथ पर पिएंगे व्हाइट वाली। एक पंथ दो काज। सेहत भी दुरूस्त और अगले टिकट के लिए 70 वाले प्रतिबंध से मुक्त।

रंगीला लाल को खटका

भागवत जी ने शुरूआत की रंग चढाने की। साढे तीन लाख पैंटधारियों को भगवा रंग से सराबोर कर गये। इस दावे के उलट तमाम चेहरे उजले क्यों? जवाब में एक पूर्ण पैंटधारी ने पहले थोडी देर दंड-बैठक लगाई, एक गीत गाया और तब बोला-भागवत जी की पिचकारी का रंग चमकने में वक्त लगेगा और देखना वक्त पर ही चमकने लगेगा। झंडूलाल सारी बात समझ गये। बोले-सीधे-सीधे कहो कि रंग 2019 में चमकेगा।

भगवा रंग में कर गए सरोबार 

भूतपूर्व, वर्तमान प्रसाद, कामरेड, सपाई, कांग्रेसी सब के सब टाउनहाल पर जमा हुए जहां इस बार जमकर नीली स्याही से होली खेली जा रही थी। वहीं मुकुंदी की धर्मशाला की ओट में कुछ स्मार्ट नौजवान होली के हुडदंग से विरत अपने-अपने मोबाइल स्क्रीन पर आंखे गढाए ध्यान मुद्रा में खडे थे। यह नजारा रंगीला लाल को खटका। उनके ध्यान में खलल डाल बोल पडे-अरे तुम लोग चुप्पी क्यों साधे हो? नाचो-गाओ और गुलाल उडाओ। एक लडके की कातर नजर रंगीला पर पडी। बोला – वही कर रहा हू़ं। रंगीला का अगला सवाल -मोबाइल में कैसा डांस? लडके ने मोबाइल सक्रीन रंगीला की आंखों के सामने कर दी। अब तो प्रिया प्रकाश का एब्रो डांस देखते ही रंगीला शरमा-सा गया और गाल फुला कर वहां से सरक लिया। जोगीरा. . . . . . . . सारारारा. . . बुरा ना मानो होली है।

 

प्रस्तुति : जितेन्द्र दीक्षित

 

 

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