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सपा-बसपा की नजदीकी : बहुत कठिन है डगर पनघट की

लखनऊ (धीरेश सैनी) ।

उत्तर प्रदेश की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव में सपा-बसपा की नजदीकी पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की टिप्पणी कोरा तंज नहीं है। सपा-बसपा के मेल को बेर-केर (बेर-केला) का संग कहने की वजहें इन दोनों पार्टियों के अतीत में है जिसे योगी ने बाकायदा याद भी दिलाया। सवाल यही है कि जिन प्रवृत्तियां ने अतीत में इन दोनों पार्टियों की दोस्ती को गहरी दुश्मनी में तब्दील कर दिया था, क्या उनसे पार पा लिया गया है। लेकिन, इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस नजदीकी को ऊपरी तौर पर भले ही योगी तंज में उड़ाने की कोशिश करें पर उन्हें याद है कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उरूज पर पहुंच गई हिंदुत्व की सियासत को इस गठबंधन ने जमीन दिखा दी थी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों के उपचुनाव में सपा को बसपा के समर्थन की चर्चाओं के बारे में पत्रकारों के सवाल पर पर कहा कि ‘बेर-केर’ का मेल नहीं हो सकता। उन्होंने रहीम का मशहूर दोहा भी पढ़ा – `कह रहीम कैसे निभे, बेर केर का संग। यै डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।। `' इस सवाल पर कि `केर कौन और बेर कौन, योगी ने कहा यह स्वयं अनुमान लगाएं। यह किसी से छुपा नहीं है कि गेस्ट हाउस कांड किसने किया और स्मारकों को ध्वस्त करने की चेतावनी कौन लोग दे रहे थे।
योगी के तंज ने उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के ऐतिहासिक गठबंधन और गेस्ट हाउस कांड के रूप में उसके वीभत्स अंत की याद को ताजा कर एक तरह मायावती के पुराने जख्मों को भी छेड़ा। 1993 में सपा-बसपा गठबंधन की सरकार बनी थी तो सपा के मुखिया मुख्यमंत्री मुलायम सिंह और बसपा के शिल्पकार कांसीराम व उनकी सिपेहसालार मायावती अपने बहुप्रचारित सिद्धांतों को साकार करने के बजाय आरोप-प्रत्यारोप, अविश्वास और अहंकार के प्रदर्शन के लिए चर्चित हुए थे। 1995 में बसपा ने सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा की तो लखनऊ में गेस्ट हाउस में ठहरीं मायावती पर सपा के बाहुबली नेताओं ने हमला बोल दिया था। तब भाजपा खेमा उऩकी हिफाजत में आया था और बहुजनवादी नेता अपने घोषित मनुवादी शत्रु के साथ हो लिए थे। भाजपा से बसपा के रिश्तों की लव एंड हेट रिलेशनशिप की भी एक अलग कहानी है पर फिलहाल सवाल यह है कि क्या मायावती और सपा का लश्कर उन प्रवृत्तियों से ऊपर उठ चुका है। योगी का सवाल असल में राजनीतिक विश्लेषकों का भी सवाल है कि यह मेल कितनी देर तक और कितनी दूर तक चल सकता है।
जाहिर है कि पिता मुलायम की कारगुजारियों से ही सबसे ज्यादा आशंकित रहने वाले सपा के नेता अखिलेश और बसपा सुप्रीमो मायावती दोनों ही संकट में हैं। यहां तक कि अपने आधार वोट बैंक माने जाने वाले समुदायों में ही दोनों की विश्वसनीयता संदिग्ध बनी हुई है। यह बात अलग है कि कोई राह न सूझने जैसी वलनरेबल स्थिति में फंसे उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने सपा का दामन थामे रखा लेकिन न मुलायम सिंह और न उनके बेटे अखिलेश मुसलमानों के गाढ़े वक्त के दोस्त साबित हो सके। मुलायम की तो सेकुलर छवि बार-बार सवालों के घेरे में आती रही। यहां तक कि वे भाजपा के मददगार की भूमिका में ही नजर आने लगे। जहां तक यादव मतदाताओं का सवाल है तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में योगी की आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति की जमीनी सेना का बड़ा हिस्सा पिछड़ा वर्ग ही है। गोरखपुर और आसपास उऩकी हिंदू वाहिनी में यादवों की संख्या भी काफी है। मुलायम फैमिली के हाथ से सत्ता के निकलने के बाद बहुत से आम यादव जन शासन-प्रशासन से पड़ने वाले रोजमर्रा के कामों के लिए हिंदू वाहिनी में शामिल अपने रिश्तेदारों के जरिये योगी के नजदीक पहुंच रहे हैं। ऐसी स्थिति में गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनावों में सपा बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाती है तो सपा से यह भगदड़ और तेज हो सकती है। मायावती के पास भी न सदन में ताकत है और न उनके पुराने तेवर बचे रहे गए हैं। कांसीराम की छाया में सियासी जिंदगी की शुरुआत में गांव-गांव, शहर-शहर घूमकर जान की परवाह किए बगैर दलितों के शोषकों को सीधे ललकारने वाली मायावती सत्ता के वैभवशाली गलियारों में रहकर धारहीन लगने लगी हैं। वे राज्यसभा से तेवर के साथ निकली जरूर थीं और इस्तीफा देते वक्त उन्होंने आंदोलन खड़े करने का ऐलान भी किया था पर वे ऐसा कर नहीं सकीं। उलटे सहारनपुर जिले में चंद्रशेखर रावण और गुजरात में जिग्नेश मेवानी जैसे युवा नेता दलितों के बीच मायावती के मुकाबले ज्यादा खतरे उठाने वाले और ज्यादा खरे नजर आने लगे। उत्तर प्रदेश में ही दलितों पर अत्याचार की घटनाओं पर मायावती ढंग से विरोध तक नहीं जता सकीं।
ऐसी स्थितियों में सपा और बसपा दोनों के लिए ही नजदीक आना मजबूरी भी है और समझदारी भी। 2019 को लेकर ऐसे किसी मेल का दावा करना अभी जल्दबाजी होगा। खुद मायावती ने इस नजदीकी को 2019 के मेल के रूप में भी देखे जाने को फिलहाल खारिज कर दिया है। लेकिन, यह भी सच है कि इस तुरत-फुरत वाले मेल के भविष्य को लेकर तमाम विरोधाभासों के बावजूद न योगी और न आरएसएस निश्चिंत रह सकते हैं। गेस्ट हाउस कांड को मायावती नहीं भूल सकती हैं तो भगवा ब्रिगेड भी ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जय श्रीराम’ नारे को नहीं भूल सकती है। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बीजेपी की कल्याण सरकार बर्खास्त कर दी गई थी तो आरएसएस-बीजेपी की हिंदुत्ववादी सियासत अपने पूरे रंग में थी। लेकिन 1993 के विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन ने ही उत्तर प्रदेश में भाजपा को जमीन दिखा दी थी। ऐसे में योगी की टिप्पणी को महज तंज समझने के बजाय उनकी चिंता भी समझा जा सकता है। लेकिन सपा और बसपा के लिए भी ये ही कहा जा सकता है कि बहुत कठिन है डगर पनघट की।
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