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राष्ट्र को बचाना है तो संस्कृति और शिक्षा की रक्षा करनी होगी : शंकराचार्य स्वामी दिव्यानन्द तीर्थ

शुक्रताल (मुजफ्फरनगर) ।

यदि राष्ट्र को बचाना है तो संस्कृति और शिक्षा की रक्षा करनी होगी की रक्षा करना होगी। कान्वेन्ट एजुकेशन से अक्षर ज्ञान तो हो सकता है लेकिन संस्कृति और संस्कार नही बचाये जा सकते।देश के पहले प्रधान मंत्री पण्डित नेहरू ने कहा था कि हमे हमारे देश की बहुत सी खिड़कियों को खोलना है जिससे हर संस्कृति की हवा हमारे यहाँ आ सके लेकिन वह भूल गए कि किस मौसम में कोन सी खिड़की खोलनी है। उक्त विचार भानुपुरा पीठ के शंकराचार्य स्वामी दिव्यानन्द तीर्थ ने व्यक्त किए।

शंकराचार्य शुकतीर्थ स्थित हनुमत धाम में हनुमत जन्मोत्सव पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे।उन्होंने कहा कि भले ही हम छुरी कांटे से टेबल पर बैठकर भोजन करना ना जानते हो लेकिन घर आये अतिथि का सत्कार करना हमे आता हैं और यहीं भारतीय संस्कार है। उन्होंने कहा कि देश के शिक्षा पाठ्यक्रम में जानबूझ कर संस्कार परक और राष्ट्र भक्ति परक विषयों को निकाला जा रहा है और देश के युवाओं को अंधी दौड़ में धकेला जा रहा है।हनुमत धाम के संस्थापक चक्र जी महाराज का संस्मरण करते हुए भानुपुरा पीठाधीश्वर ने कहा कि चक्र जी जैसे बिरले सन्त अब कम ही देखने को मिलते है उन्होंने ईश्वर से भाव सम्बन्ध बनाया और उससे साक्षत्कार किया।हनुमत चरित्र की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि हनुमान जी ज्ञानियों में न केवल अग्रगण्य है वरन सेवाव्रती के आदर्श कृतित्व है जिनका चरित्र सिर्फ पढ़ने के लिए नही अनुकरण के लिए है।हनुमत धाम पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर केशवानन्द जी महाराज ने आगन्तुक सन्तों का स्वागत करते हुए हनुमतभक्तों से लोकेषणा से दूर रहने की सलाह दी इस अवसर पर महामंडलेश्वर स्वामी विनय स्वरूप,स्वामी महेशानन्द गिरी,डॉ0 बाल चन्द्रिका पाठक, स्वामी भगवत स्वरूप आचार्य,आनन्द स्वरूप ब्रह्मचारी,स्वामी अरुण दास,, स्वामी भूमानन्द सरस्वती,गीतानन्द तीर्थ सहित अनेक विद्वानों ने हनुमत चरित्र की चर्चा की।कार्यक्रम का संचालन अरुण खण्डेलवाल ने किया।

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