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भारतीय प्रतिस्‍पर्धा आयोग (सीसीआई) ने गुटबंदी से जुड़ा अंतिम आदेश जारी किया

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नई दिल्ली- भारतीय प्रतिस्‍पर्धा आयोग (सीसीआई) ने मोटर वाहनों के मूल उपकरणों के तीन निर्माताओं (ओईएम) को इलेक्ट्रिक पावर स्‍टीयरिंग (ईपीएस) सिस्‍टम्स की आपूर्ति करने के संबंध में एनएसके लिमिटेड, जापान (एनएसके) और जेटीईकेटी कॉरपोरेशन, जापान एवं उनकी भारतीय सहयोगी कंपनियों क्रमश: राणे एनएसके स्‍टीयरिंग सिस्‍टम्‍स लिमिटेड (आरएनएसएस) तथा जेटीईकेटी सोना ऑटोमोटिव इंडिया लिमिटेड (जेएसएआई) के बीच गुटबंदी से जुड़ा अंतिम आदेश जारी किया है। यह गुटबंदी प्रत्‍यक्ष अथवा परोक्ष रूप से मूल्‍य तय करने, बाजारों को आवंटित करने, बोली संबंधी कार्यों में घालमेल और इन तीन ऑटोमोबाइल ओईएम द्वारा जारी सूचना अनुरोध/कोटेशन अनुरोध (आरएफआई/आरएफक्‍यू) से जुड़ी बोली प्रक्रिया में हेर-फेर के जरिए की गई है। यह गुटबंदी वर्ष 2005 से लेकर 25 जुलाई, 2011 तक की गई थी।

प्रतिस्‍पर्धा अधिनियम, 2002 की धारा 46 के तहत सीसीआई को एनएसके/आरएनएसएस से प्राप्‍त एक आवेदन के आधार पर इस दिशा में पड़ताल शुरू की गई थी। इसे भारतीय प्रतिस्‍पर्धा आयोग (अपेक्षाकृत कम जुर्माना) नियम, 2009 (एलपीआर) के साथ पढ़ें। इसके बाद जांच के लंबित होने के दौरान जेटीईकेटी/जेएसएआई ने भी अधिनियम की धारा 46 के तहत सीसीआई के यहां आवेदन दाखिल किया था। इसे एलपीआर के साथ पढ़ें। इसे मामले में एकत्रित साक्ष्यों में बैठकों के साथ-साथ टेलीफोन पर हुई बातचीत के अंश भी शामिल हैं। इन वार्ताओं से यह पता चला कि कीमतों को लेकर वाणिज्यिक दृष्टि से संवेदनशील मानी जाने वाली सूचनाओं इत्‍यादि पर विचार-विमर्श किया गया था। संबंधित पक्षों के इस तरह के आचरण से भारत में प्रतिस्‍पर्धा पर व्‍यापक प्रतिकूल असर होने के बारे में पता चला। तदनुसार, सीसीआई ने यह पाया कि एनएसके और जेटीईकेटी एवं उनकी भारतीय सहयोगी कंपनियां क्रमश: आरएनएसएस तथा जेएसएआई धारा 3(3)(ए) के प्रावधानों का उल्‍लंघन कर प्रतिस्‍पर्धा रोधी आचरण में लिप्‍त रही हैं। इसे अधिनियम की धारा 3(1) के साथ पढ़ें।

सभी संबंधित कारकों (फैक्‍टर) पर विचार करते हुए अधिनियम की धारा 27(बी) के प्रावधानों के अनुसार प्रत्‍येक पक्ष के लिए जुर्माना यानी पेनाल्‍टी की गणना की गई। इसकी गणना अधिनियम की धारा 3 के प्रावधानों के लागू होने की तिथि अर्थात 20 मई, 2009 से लेकर 25 जुलाई, 2011 तक के लिए की गई। इसके अनुसार ही एनएसके/आरएनएसएस पर लगाई जाने वाली पेनाल्‍टी की गणना आरएनएसएस के संबंधित कारोबार (टर्नओवर) के 4 प्रतिशत की दर से की गई थी। इसी तरह जेटीईकेटी/जेएसएआई पर लगाई जाने वाली पेनाल्‍टी की गणना जेएसएआई के संबंधित मुनाफे के एक गुना की दर से की गई थी। इसके अलावा, इस मामले से जुड़े तथ्‍यों और परिस्थितियों की समग्रता को ध्‍यान में रखते हुए अधिनियम की धारा 27(बी) के अनुसार एनएसके और जेटीईकेटी, जिन्‍हें अधिनियम की धारा 48 के तहत उत्तरदायी ठहराया गया था, पर लगाई जाने वाली पेनाल्‍टी की गणना पिछले तीन वर्षों के दौरान उनकी आमदनी के औसत के 10 प्रतिशत की दर से की गई थी।

चूंकि एनएसके/आरएनएसएस ने ही सबसे पहले ‘कम पेनाल्‍टी वाली आवेदक’ के रूप में आयोग के यहां आवेदन किया था और इसके साथ ही पूर्ण एवं सही जानकारियां दी थीं, इसलिए एनएसके/आरएनएसएस और उनकी सहयोगी कंपनियों के लिए पेनाल्‍टी में शत-प्रतिशत कटौती करने की मंजूरी दी गई। यही नहीं, चूंकि जेटीईकेटी/जेएसएआई ने ‘कम पेनाल्‍टी वाली आवेदक’ के रूप में आयोग के यहां बाद में आवेदन किया था और इसने संबंधित मामले में महत्‍वपूर्ण जानकारियां दी थीं, इसलिए जेटीईकेटी/जेएसएआई और उसकी सहयोगी कंपनियों के लिए पेनाल्‍टी में 50 प्रतिशत की कटौती को मंजूरी दी गई। अत: जेटीईकेटी/जेएसएआई को 17,07,31,443 रुपये का कुल जुर्माना देना है।

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