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ऊर्जा गुरु के समर्थन में उतरा संत समाज,सीएम कमलनाथ को भेजी खून से लिखी चिट्ठी

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उज्जैन। पिछले कई दिनों से उज्जैन को पवित्र नगरी बनाए जाने की मांग कर रहे जैन धर्म के प्रमुख संत ऊर्जा गुरु अरिहंत ऋषि के समर्थन में गुरूवार को उज्जैन में साधू संतों की एक टोली का क्रांतिकारी रुख देखने को मिला। देवास रोड स्थित होटल के सभागार में स्वर्णिम भारत मंच के बुलावे पर करीब 100 से अधिक साधू संत एकत्रित हुए और ऊर्जा गुरु के उज्जैन को पवित्र नगरी बनाए जाने की मांग को देशहित में बताया। इस दौरान उन्होंने ऊर्जा गुरु द्वारा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के नाम खून से लिखे खत पर अपने हस्ताक्षर भी किए। संत समाज की तरफ से उज्जैन के विभिन्न अखाड़ों से जुड़े साधु संतों ने एक स्वर में उज्जैन को पवित्र नगरी घोषित कराने का संकल्प दोहराया। बड़ी संख्या में उपस्थित हुए महामंडलेश्वर से लेकर बड़े-बड़े अखाड़ों के संतों के बीच मुंबई से आए ऊर्जा गुरु अरिहंतऋषि और स्वामी जीतेन्द्रनन्द सरस्वती ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। इस दौरान निर्वाणी अखाड़ा के महंत दिग्विजय दास महाराज, मंच के दिनेश श्रीवास्तव भी मौजूद रहे।
होटल के सभागार में आयोजित हुए कार्यक्रम में ऊर्जा गुरु ने अपना क्रांतिकारी रवैया जारी रखते हुए कहा कि, “सभी साधु संतों के सहयोग से उज्जैन नगरी पवित्र घोषित होगी। आज प्रदेश में सनातम धर्म के मंदिरों में प्रशासन के अधिकारी बैठे हैं, जबकि किसी भी मस्जिद या चर्च परिसर ने प्रशासनिक अधिकारियों का कब्ज़ा नहीं होता है। यदि कमलनाथ जल्द से जल्द इस विषय पर गंभीर नहीं हुए तो संत समाज और अधिक आक्रोशित नजर आएगा। सिर्फ संत समाज ही नहीं बल्कि देशभर से जो लोग इस मुहीम में जुड़े हैं, वह भी एक एक दिन का अनशन कर, अपनी बात प्रशासन तक पहुचाएंगे और मांगे पूरी न होने तक ये अनशन की प्रक्रिया ऐसे ही जारी रहेगी। यदि हमारी मांगों को नजरअंदाज किया गया तो सीएम साहब इस बात का ख्याल रखें कि इसके विपरीत और बेहद भयावय परिणाम भी हो सकते हैं।“
वहीँ स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि, “उज्जैन के साधू संतों को एकजुट होकर इसे पवित्र नगरी घोषित कराने को लेकर प्रतिकार करना होगा। हमारे कदम बढ़ाए बगैर उज्जैन को पवित्र नगरी घोषित नहीं किया जा सकता। सनातन धर्म की रक्षा के लिए सभी साधु संतो को एकता का सुर साधना होगा, नहीं तो कोई भी हमारी आवाज दबा के निकल जाएगा।“ मुख्यमंत्री के नाम खून से लिखे पत्र में लिखा गया कि, पुण्य सलिला मां शिप्रा तट पर स्थित उज्जैयिनी को भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक काया का मणिपुर चक्र माना गया है। इस नगरी को भारत की मोक्षदायिका सप्त प्राचीन पुरियों में एक माना गया है।
संत समाज का कहना है कि पहले भी इस मुद्दे को लेकर आंदोलन हुए हैं। लेकिन खून से लिखा गया खत अब एक निर्णायक आंदोलन के रूप में देखा जाना चाहिए। उज्जैन केवल सनातन तीर्थ ही नहीं है बल्कि सम्पूर्ण देश की भावनाएं भी इस शहर से जुड़ी हुई हैं। पिछले दिनों उज्जैन में पवित्र नगरी के प्रावधानों का पालन कराने के लिए संत अरिहंत ऋषि ने जन अभियान छेड़ने की बात भी कही थी। उन्होंने महावीर जयंती के मौके पर जन आंदोलन छेड़ने का एलान भी किया था। जिसको प्रशासन ने अनदेखा किया। ऊर्जा गुरु का मानना है कि राज्य सरकार द्वारा घोषित पवित्र क्षेत्र में मांस मदिरा की दुकानें नहीं होनी चाहिए। लेकिन उज्जैन में धड़ल्ले से इस कारोबार को हवा दी जा रही है, और किसी प्रकार की कानूनी कार्रवाई होती नहीं दिखा रही है।

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