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नहीं रुका गैंडों का शिकार, 2 वर्षों में में 32 को मारा गया,69 शिकारी गिरफ्तार आरटीआई से खुलासा

नई दिल्ली। वर्ष 2018 में लगाई गई एक आरटीआई से बड़ा खुलासा हुआ था के पिछले दस वर्षों में 102 एक सींघ वाले गैंडों का शिकार देश भर में हुआ था, इसके बाद मीडिया के माध्यम से देश भर में उसकी चर्चा रही। यहाँ तक की काज़ीरंगा राष्ट्रिय उद्यान में तो 100 से ज़्यादा वन रेंजरों की भर्ती भी की गई, जिससे इनके शिकार पर लगाम लग सके।

सामाजिक कार्यकर्ता रंजन तोमर ने 2018 के बाद की स्तिथि को जानने के लिए वन्यजीव अपराध नियन्त्र ब्यूरो में एक आरटीआई लगाई थी, जिसमें पिछले दो वर्षों में इन गैंडों के शिकार सम्बन्धी जानकारी मांगी गई थी, इसके जवाब में ब्यूरो कहता है के इस दौरान 32 गैंडों को मौत के घात उतार दिया गया , इसके साथ ही पिछले दो वर्षों में 69 शिकारियों को भी इस जुर्म में पकड़ा गया है।   भारतीय गैण्डा, जिसे एक सींग वाला गैण्डा भी कहते हैं, विश्व का चौथा सबसे बड़ा जलचर जीव है। आज यह जीव अपने आवासीय क्षेत्र के घट जाने से संकटग्रस्त हो गया है। यह पूर्वोत्तर भारत के असम और नेपाल की तराई के कुछ संरक्षित इलाकों में पाया जाता है जहाँ इसकी संख्या हिमालय की तलहटी में नदियों वाले वन्यक्षेत्रों तक सीमित है। इतिहास में भारतीय गैण्डा भारतीय उपमहाद्वीप के सम्पूर्ण उत्तरी इलाके में पाया जाता था जिसे सिंधु-गंगा-ब्रह्मपुत्र का मैदान कहते हैं। यह सिन्धु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदियों के मैदानी क्षेत्रों में, पाकिस्तान से लेकर भारतीय-बर्मा सरहद तक पाया जाता था और इसके आवासीय क्षेत्र में नेपाल, आज का बांग्लादेश और भूटान भी शामिल थे। ऐसा माना जाता है कि यह बर्मा, दक्षिणी चीन तथा इंडोचाइना में भी विचरण करता हो लेकिन यह सिद्ध नहीं हो पाया है। यह जाति सन् 1600 तक उत्तर-पश्चिमी भारत और पाकिस्तान में आसानी से देखी जा सकती थी, लेकिन इसके तुरन्त बाद इस इलाके से विलुप्त हो गई। अपने अन्य आवासीय क्षेत्रों में भी यह सन् 1600 से 1900 तक तेज़ी से घटे और बीसवीं सदी की शुरुआत में यह विलुप्तता की कगार में खड़ा था। एक अनुमान के मुताबिक आज जंगली हालात में केवल 3000 से कुछ अधिक भारतीय गैण्डे बचे हैं जिसमें से लगभग 2000 तो केवल भारत के असम में ही पाये जाते हैं।

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