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राज्यसभा में विपक्ष बोला- आत्ममुग्ध सरकारें, आत्मनिर्भर भारत नहीं बना सकतीं

नई दिल्ली । कृषि कानूनों को लेकर राज्यसभा में बृहस्पतिवार को भी विपक्ष ने सरकार पर जमकर निशाना साधा। कांग्रेस समेत विभिन्न विपक्षी दलों ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग करते हुए कोई स्वीकार्य हल निकालने का सुझाव दिया। विपक्ष ने सरकार पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आत्ममुग्ध सरकारें, आत्मनिर्भर भारत का निर्माण नहीं कर सकतीं। उच्च सदन में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर पेश धन्यवाद प्रस्ताव को लेकर हो रही चर्चा में भाग लेते हुए विपक्षी दलों के सदस्यों ने सरकार से सवाल किया कि किसानों को आंदोलन करने की नौबत क्यों आई? साथ ही उन्होंने सरकार से अनुरोध किया कि वह किसानों के दर्द को समझे और उन्हें दूर करने की कोशिश करे। हालांकि भाजपा ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में ऐसे सुधारों का जिक्र किया था लेकिन अब उसके सुर बदल गए हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एवं जद (एस) नेता एच डी देवेगौड़ा ने किसानों को राष्ट्र की रीढ़ बताते हुए कहा कि उनकी समस्याओं को सुना जाना चाहिए और एक स्वीकार्य समाधान निकाला जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर राजधानी दिल्ली में किसानों की ट्रैक्टर परेड के दौरान जो कुछ हुआ उसमें असामाजिक तत्वों की भूमिका थी जिसकी पूरे देश ने और सभी राजनीतिक दलों ने निंदा की। उन्होंने दोषियों को सजा देने की मांग की और कहा लेकिन किसानों के मुद्दे को इस घटनाक्रम से पूरी तरह अलग रखा जाना चाहिए। चर्चा में हिस्सा लेते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि सत्ता पक्ष की ओर से जितने भी वादे किए गए, आज तक उनमें से एक भी वादा पूरा नहीं किया गया, चाहे वह काले धन को वापस लाने का वादा हो या भ्रष्टाचार खत्म करने का या फिर दो करोड़ रोजगार सृजन का वादा हो। सिंह ने कहा कि संसद के पिछले सत्र में तीनों कृषि विधेयकों को मंजूरी दी गई। उन्होंने कहा कि हमें कहा जाता है कि हमने अपने घोषणापत्र में इन कृषि सुधारों का वादा किया था। लेकिन सच यह है कि हमने इन विधेयकों को प्रवर समिति में भेजने की मांग की थी। भाजपा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि किसान देश के लिए रीढ़ की हड्डी और अन्नदाता हैं तथा वे अपना ही नहीं पूरे विश्व का पेट भरते हैं। उन्होंने नए कृषि कानूनों का बचाव करते हुए कहा कि तीनों कानून इसलिए लाए गए ताकि किसानों की प्रगति हो सके। उन्होंने कहा कि देश को राजनीतिक आजादी करीब 70 साल पहले मिल गई थी लेकिन किसानों को उनकी वास्तविक आजादी नहीं मिल पाई। भाजपा नेता ने कहा कि नए कृषि कानूनों से किसानों को आजादी मिल सकेगी और वे देशभर में कहीं भी अपनी उपज बेच सकेंगे जिससे उनकी आय भी बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि किसानों के साथ 11 बार संवाद हुआ है और सरकार ने 18 महीने कानून स्थगित करने की भी बात की है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार किसानों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है। सिंधिया ने इस क्रम में कांग्रेस पर हमला बोला और कहा कि पार्टी ने 2019 में अपने चुनावी घोषणा पत्र में कृषि सुधारों का वायदा किया था। इसके अलावा राकांपा नेता और तत्कालीन संप्रग सरकार में कृषि मंत्री शरद पवार ने 2010-11 में सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर कृषि क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को अनिवार्य बनाने संबंधी बात की थी। सिंधिया ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, जुबान बदलने की आदत बदलनी होगी, जो कहें, उस पर अडिग रहें। केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने चर्चा में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि सरकार किसानों को एक लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त आमदनी मुहैया कराएगी और यह रकम अपशिष्ट को ऊर्जा में तब्दील करने से हासिल होगी। प्रधान ने कांग्रेस पर लंबे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कानून नहीं लाने और अब इस मुद्दे को लेकर वर्तमान सरकार पर सवाल उठाने के लिए अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि 2014 में सत्ता में आने के बाद से नरेंद्र मोदी सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीद में उल्लेखनीय वृद्धि की है। कांग्रेस के दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने किसान आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि इस आंदोलन का आज 72वां दिन है और बातचीत के 11 दौर बेनतीजा रहे। उन्होंने कहा पहले अध्यादेश और फिर आनन-फानन में कृषि विधेयकों को पारित किया गया। किसान मना करते रहे और आखिर में उन्होंने शांतिपूर्वक आंदोलन करने का रास्ता चुन लिया। दिल्ली की सीमाओं पर उनका आंदोलन जारी है। बेनतीजा बातचीत हुई। किसानों को सरकार की ओर से केवल अपमान मिला। हुड्डा ने कहा कि 26 जनवरी को लाल किले पर जो हुआ वह असहनीय है। दोषियों के खिलाफ कार्रवाई जरूर होनी चाहिए लेकिन कोई निर्दोष इसमें नहीं फंसना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसानों पर आरोप लग रहे हैं। लेकिन असलियत तो यह है कि धरनास्थल पर भी इन किसानों ने किसी को परेशान नहीं किया है। अब से पहले किसी भी आंदोलन में इतने किसानों की जान नहीं गई जितनी अभी गई है। लेकिन किसान विचलित नहीं हुए। फिर भी आरोप उन पर ही लगाए जा रहे हैं। हुड्डा ने आरोप लगाया कि किसानों को बदनाम करने के लिए प्रचार तंत्र झोंक दिया गया है। उन्हें गद्दार कहा जा रहा है। मैं पूछना चाहता हूं कि अगर सीमा पर आंदोलन करते बैठा किसान गद्दार है तो सीमा पर तैनात उसका बेटा क्या है? सीमाओं से इसी किसान का बेटा शहीद होकर तिरंगे में लिपटा आता है और इसी किसान का बेटा ओलंपिक में पदक जीतकर देश का नाम रोशन करता है। फिर किसानों पर आरोप कैसे लगाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि आज दिल्ली की सीमाओं पर किसानों और जवानों के बीच कीलें लगा दी गई हैं। लेकिन मैं कहूंगा कि देश का अन्नदाता कभी किसी का गुलाम नहीं बन सकता। कोई कील सच को दबा नहीं सकती। उन्होंने सरकार से तीनों कानूनों को वापस लेने, किसानों पर दर्ज मुकदमे तत्काल वापस लेने और आत्ममंथन करने की मांग की। उन्होंने कहा कि आत्ममुग्ध सरकारें आत्मनिर्भर भारत का निर्माण नहीं कर सकतीं। तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन ने सरकार पर हर मोर्चे पर विफल रहने का आरोप लगाते हुए कहा कि 26 जनवरी को राजधानी दिल्ली में जो कुछ हुआ, उसके लिए सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार है। उन्होंने दावा किया कि तीनों कृषि कानूनों के विरोध में राजधानी की सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन के दौरान कई किसानों की जान जा चुकी है। तृणमूल कांग्रेस के सदस्यों ने आंदोलन के दौरान कथित तौर पर जान गंवाने वाले किसानों के सम्मान में डेरेक ओ ब्रायन की अगुवाई में कुछ पलों का मौन रखा। राजद सदस्य मनोज झा ने कहा कि किसानों के मुद्दे पर दलगत भावना से ऊपर उठकर विचार करने की जरूरत है। उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण में 19 विपक्षी दलों के भाग नहीं लेने का जिक्र करते हुए कहा कि उसमें शामिल नहीं होने का उन्हें भी दुख है लेकिन जब चीजें वास्तविकता से दूर हों तो उसमें कैसे भाग लिया जा सकता है।     चर्चा में भाग लेते हुए मनोनीत सदस्य स्वप्न दासगुप्ता ने कहा कि देश में हुयी हरित क्रांति का लाभ पंजाब को विशेष रूप से मिला और वहां इससे किसानों में खुशहाली आई। लेकिन पश्चिम बंगाल सहित पूर्वी भारत का एक बड़ा हिस्सा उस क्रांति के लाभों से दूर रहा। दासगुप्ता ने कहा कि नए कानूनों से ऐसे किसानों को लाभ मिल सकेगा जो लाभ से वंचित रह गए हैं। माकपा के विकास रंजन ने कहा कि सरकार को किसानों की बात सुननी चाहिए और मुझे नहीं लगता कि कानूनों को रद्द करने में कोई दिक्कत है। आम आदमी पार्टी के संजय सिंह ने कहा कि किसानों के आंदोलन के दौरान 100 से अधिक किसानों की जान जा चुकी है लेकिन उनकी परेशानी दूर करने के बजाय उन्हें आतंकवादी कहकर अपमानित किया जा रहा है।

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