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समय के साथ बदल गए चुनावी नारों के बोल, अब व्यक्तिगत हमले ज्यादा दिख रहे हैं

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लखनऊ। इस बार के चुनावी मौसम में नये राजनीतिक समीकरणों और प्रचार की आक्रामकता काफी बदली हुई दिख रही है। पहले की अपेक्षा इस बार व्यक्तिगत हमले ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। गली कूचों में छोटी छोटी टोलियों में अक्सर विरोधी उम्मीदवार को चुटीले अंदाज में ताने देकर चुनावी माहौल को गर्मा ने वाले नारे इस बार कहीं न कहीं अपनी दिशा से भटके से दिख रहे हैं।
कभी एक दूसरे के खिलाफ नारा लगाने वाले सपा और बसपा एक साथ हैं तो नयी दोस्ती के मायने और जनसभाओं में लगने वाले नारे भी बदल गये हैं। बात भाजपा और कांग्रेस की करें तो आरोपों-प्रत्यारोपों ने नारों का रूप ले लिया है। युवा कवि शिवम ने बातचीत में कहा कि वो जमाने लद गये जब कवियों और शायरों को नारे लिखने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी और वे नारे जनमानस में ना सिर्फ लोकप्रिय होते थे बल्कि चुनावी दशा और दिशा भी तय करते थे। उन्होंने कहा कि अब कवियों शायरों की लेखनी सोशल मीडिया की आंधी में खो गयी है। हर कोई नया पुराना, लिखने या ना लिखने वाला कुछ गढ़ देता है, इसके अलावा नारों का स्तर भी गिरा है। सत्ताधारी दल की ओर से आया कि मैं भी चौकीदार तो कांग्रेस की ओर से आया चौकीदार चोर है। इन दो वन लाइनर से सोशल मीडिया पटा पड़ा है। उन्होंने फिर एक बार, मोदी सरकार को भाजपा का मंत्र बताया तो गरीबी पर वार 72 हजार को कांग्रेस का मजबूत वार कहा। सपा-बसपा-रालोद गठबंधन को लेकर नारे तो गढ़े गये लेकिन वह ज्यादा मुखर नहीं बन पाये। तोड़ दो सारे बंधन को, वोट करो गठबंधन को और जन जन की उम्मीदों के साथी, हैंडपंप, साईकिल और हाथी चुनावी बयार में चल जरूर रहे हैं। दिलचस्प है कि एक समय सपा के खिलाफ चढ़ गुंडन की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर का नारा देने वाली बसपा अब सपा के साथ है और 2019 का चुनाव मिल कर लड़ रही है। इस गठबंधन के बाद नारों का रंग रूप बदलना स्वाभाविक था। वहीं यूपी को ये साथ पसंद है का नारा देने वाली सपा को अब कांग्रेस नापसंद है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि मिले मुलायम कांशीराम, हवा हो गए जयश्रीराम … 1993 में जब यूपी में सपा और बसपा ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था तो भाजपा को टार्गेट करता हुआ ये नारा काफी चर्चित रहा। इसी तरह, 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा का नारा हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है ऐसा चला कि गली कूचों में यही गूंजता रहा। उसी चुनाव में उस समय की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी का नारा, यूपी में है दम क्योंकि जुर्म यहां है कम। भारी प्रचार के बावजूद चल नहीं पाया। 2014 में भाजपा ने नारा दिया, अबकी बार मोदी सरकार जो खूब कहा सुना गया जबकि कांग्रेस का नारा कट्टर सोच नहीं, युवा जोश असर नहीं दिखा पाया। 1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का नारा जात पर न पात पर मुहर लगेगी हाथ पर, खूब चला था। चुनाव

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