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गुड़ एवं उसके बनाने की प्रक्रिया हमारी सांस्कृति धरोहर है: जिलाधिकारी

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मुजफ्फरनगर- जिलाधिकारी अजय शंकर पाण्डेय ने कहा कि जनपद मुजफ्फरनगर में इसी माह ‘गुड महोत्सव’ का आयोजन किया गया था। गुड़ महोत्सव के दौरान गुड़ महोत्सव संगोष्ठी पण्डाल में विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श भी हुआ। गुड़ व कोल्हू को लेकर तमाम सुझाव प्रस्तुत किए गए। जिलाधिकारी ने कहा कि परम्परागत कोल्हू व हल बैल से खेती की सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करना भी हमारा उद्देश्य होना चाहिए। हल बैल से खेती एवं परम्परागत कोल्हू उत्पादित गुड़ एवं उसके बनाने की प्रक्रिया हमारी सांस्कृति धरोहर है। जिलाधिकारी ने कहा कि इस सांस्कृतिक पहचान को  बनाये रखना हम सब का दायित्व है।
जिलाधिकारी आज कलैक्ट्रेट सभागार में किसानों के साथ हल बैल से खेती करने एवं बैलों द्वारा कोल्हू चलाकर गुड उत्पादित किये जाने के सम्बन्ध में बैठक कर रहे थे। जिलाधिकारी ने कहा कि बिना कैमिकल का गुड हो। जिसमें कोई भी रासायनिक खाद का इस्तेमाल न हो। उन्होने कहा कि परम्परागत ढंग से ही खेती की जाये। बुआई जुताई व केाल्हू में बैल का प्रयोग किया जाये। उन्होने कहा कि संस्कृति का अंग समझते हुए इसे जीवित रखना है। उनहोने कहा कि निराश्रित पशुओ के लिए सरकार द्वारा उनके सरंक्षण के प्रयास जारी है। बहुत सा सरकारी धन उसमे ंलग रहा है। अगर हम परम्परागत खेती पर आये तो जो आज आवारा पशुओ की समस्या है उससे निजात मिलेगी और पशु श्रम शक्ति से खेती व कोल्हूओं पर गन्ने के रस की पेराई भी हो सकेगी। इससे संस्कृति की सुरक्षा व गौसंरक्षण भी होगा।
जिलाधिकारी ने कहा कि किसान भाइयो को इस पर मंथन करना है कि इस प्रकार से खेती करने में कितनी लागत आयेगी और उस लागत का कितना मूल्य किसान को चाहिए। उन्होने कहा कि पशु श्रम शक्ति से संचालित इन कोल्हूओ से उत्पादित गुड को ‘ग्रीन गुड़’’ के नाम से बाजार में लाया जायेगा। उन्होने कहा कि हल बनाने वाले व कोल्हू बनाने वालो को खोजा जा रहा है। उनको भी रोजगार का अवसर मिलेगा। जिलाधिकारी ने कहा कि अगर ‘ग्रीन गुड़’’ बनाना है तो गन्ना की बुवाई उसी प्रक्रिया से होनी चाहिए। इसमें व्यवस्था की जानी चाहिए कि परम्परागत बैल व हल से खेत की जुताई करके एवं गोबर आधारित तमाम जैविक खादो का इस्तेमाल करके गन्ने का उत्पादन किया जाये। जिलाधिकारी ने कहा कि इस प्रक्रिया से उत्पादित गन्ने का मूल्य सामान्य प्रक्रिया से उत्पादित गन्ने के मूल्य से अधिक दिलाया जायेगा। उनहोने कहा कि प्रदेश की कई समस्याओं के समाधान का रास्ता भी है। परम्परागत कोल्हू के पुनर्जीवन से सांस्कृतिक पहचान का अस्तित्व बना रहना, बिजली की बचत, स्वच्छ पर्यावरण, कोल्हू संचालकों के लिए विशिष्ट आर्थिक समृद्धिकरण और सबसे आगे बढ़कर निराश्रित गौवंश की समस्या का समाधान संभव होगा। जिलाधिकारी ने किसानो से आवहान किया कि एक प्रोजेक्ट बनाकर प्रस्तुत करे कि हल बैल से की गई खेती का क्या मूल्य हो ओर उस गन्ने से बने गुड का क्या मूल्य मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि सभी किसान इस पर मंथन करे और हमे बताये ताकि शासन केा निति निर्धारण के लिए प्रेषित किया जा सके। उन्होंने कहा कि आपकी सहायता के लिए उप निदेशक कृषि व जिला कृषि अधिकारी से सम्पर्क कर सकते है। उन्होने कहा कि इस प्रोजेक्ट या विचार मंथन में आने वाली समस्याओं को भी इंगित किया जाये ताकि उनका भी समाधान कराया जा सके।
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