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क्योे एन्जयोग्राफी के तुरंत बाद ही स्टैंट डालने का प्रेशर बनाते हैं डाक्टर्स ?-डॉ अनुभव सिंघल डीएम कार्डियोलॉजी

एन्जियोप्लास्टी (स्टैंटिंग) क्या बला है? यह एन्जियोग्राफी में ही अगला स्टैप होता है, एंजियो में अगर किसी एक या अधिक नसों में 70 पर्सेंट से अधिक सिकुड़न पाई जाती है तो स्टेंट(छल्ले) डलवाने या बाईपास सर्जरी की सलाह दी जाती है।

 स्टैंट क्या होता हैयह बॉल-पेन के स्प्रिंग जैसा जालीदार छल्ला होता है जो अलग-अलग साइज की लंबाई और मोटाई में आता है। डिब्बे में बंद स्टैंट, तार के सिरे पर स्थित बैलून के ऊपर पिरोया हुआ होता है, तार के दूसरे सिरे पर सिरिंज से प्रेशर देने से स्टैंट के अंदर का बैलून फूल जाता है, जिससे उसके ऊपर पिरोया हुआ फोल्डिड स्टैंट, अनफोल्ड हो जाता है, इसके बाद अंदर का बैलून तार समेत बाहर खींच लिया जाता है एवं फूला हुआ स्टैंट नस के अंदर रह जाता है। वैसे तो स्टैंट दो प्रकार के होते हैं- बिना दवा लगे हुए (बेयर मेटल स्टैंट/ बीएमएस) एवं दवा वाले (ड्रग इल्यूटिंग स्टैंट्स/डीईएस/ डैस) पर आजकल केवल दवा वाले ही उपयोग होते हैं।

स्टैंट की लाइफ कितनी होती है

अमूमन स्टैंट लाइफ लोंग चलते हैं परंतु जो लोग खून पतला करने की गोलियां (एस्प्रिन/क्लॉपीडोगरेल) स्टैंट लगने के शुरुआती महीनों में ही बगैर डॉक्टर की सलाह के बंद कर देते हैं, उन्हे स्टैंट्स मे भी दिक्कत आ सकती है। लगने के बाद 1 साल तक खून पतला करने की दवा लगातार खाने एवं बिना इमरजेंसी के ऑपरेशन जैसे दांत निकलवाना, घुटने बदलवाने, रीढ की हड्डी का ऑपरेशन, प्रोस्टेट इत्यादि डिले करने चाहिए, ऑपरेशन की इमरजेंसी है तो खून पतला करने की दवाइयां ऑपरेशन से 3 दिन पहले डाक्टर की निगरानी मे बंद करके, ऑपरेशन के बाद जल्द शुरू करनी होती है। क्यों खर्चीला है स्टैंट डलवाना

हाल ही में सरकार ने सभी कंपनियों के स्टैंट का अधिकतम दाम ₹31000 कर दिया है जो कि पहले यही कंपनियां एक से दो लाख रूपये मे बेचती थी। वास्तव में बाजार में उपलब्ध लगभग सभी स्टैंट्स की क्वालिटी में ब्रांड-नेम को छोड़कर कुछ खास अंतर नहीं होता।

स्टैंटिंग कैसे करते हैं?

एंजियोग्राफी के बाद मरीज जब कैथ-लैब में टेबल पर लेटा होता है तो हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर(डीएम-कार्डियोलॉजी), मरीज के तीमारदारों को कंसोल रूम में बुलाकर, कंप्यूटर स्क्रीन पर नसों की ब्लॉकेज की रिकोर्डिंग दिखाते हैं एवं आगे कि सलाह जैसे केवल दवा से काम चल जाए, छल्ले डलवाने या बाईपास की सलाह, खर्चे का पैकेज, छल्ले डलवाने या बाईपास की अरजेंसी है या नहीं, डिस्कस करते हैं। यदि स्टैंटडालने का निर्णय होता है तो लिखित सहमति लेकर एन्जियो के तुरंत बाद इन्हें डाल दिया जाता है।एन्जिओ के दौरान हाथ या पैर की नस में डली शीथ के अंदर से धागे जितना पतला तार ब्लाकेज वाली नस में डाल दिया जाता है फिर उस तार पे चिपका बैलून चढाकर सिकुड़न वाली जगह पर पहुंचाया जाता है एवं बाहर के सिरे से प्रेशर देने पर सिकुड़न वाली जगह पर बैलून फूल जाता है जिससे नस में वहां संकरापन खत्म होकर नस चौडी हो जाती है

(बैलून एन्ज्योप्लास्टी)फिर उस बैलून को बाहर निकाल लिया जाता है एवं स्टैंट उस तार पर आगे सरका कर सिकुड़न की जगह पर पहुंचा दिया जाता है, बाहर से प्रेशर देने पर स्टैंट अनफोल्ड होकर खुल जाता है एवं हमेशा के लिए नस की सिकुड़न वाली जगह पर, नस को फैला कर रखता है।

क्यूं डॉ एन्जयोग्राफी के तुरंत बाद ही स्टैंट डालने का प्रेशर बनाते हैं

हार्ट-अटैक के मरीजों में यदि एंजि्योग्राफी में नस बंद(100%) या लगभग बंद (99%) पाई जाती है तो दिल का वह बिना खून वाला हिस्सा मृत होने की प्रोसेस में होता है जितना जल्दी नस को खोले,दिल का उतना हिस्सा डेड होने से बच जाएगा,साथ ही साथ, दिल की धड़कन के अनियंत्रित होकर बंद होने का खतरा भी उतना ही कम हो जाता है।जिन मरीजों में हार्टअटैक नहीं चल रहा होता है, केवल एन्जाइना पेन के लिए एन्ज्यो कराई जाती है वहां उसी सिटिंग में स्टैंट डलवाने की कोई अरजेन्सी नहीं होती। ज्यादातर कम जटिल मरीजों की स्टैंट डलने के एक दिन बाद छुट्टी भी हो जाती है और वह 1 सप्ताह के अंदर अपने काम पर लौट सकते हैं।

जब सरकार ने छल्ले इतने सस्ते कर दिए हैं तो भी स्टैंटिंग का खर्चा लाख रुपये तक क्यू

पहले महंगे होने के कारण यही स्टैंट्स दो से तीन लाख तक में पड़ते थी, इस पैकेज में 3 दिन सीसीयू में रहने, जांचें, दवाइयां, एवं कैथ लैब खर्चा भी सम्मिलित होता है। स्टैंट डालने में प्रयोग होने वाला महंगा सामान जैसे तार, वायर, बैलून, कैथैटर,दवाईया,प्रैशरकिट,डाई इत्यादि होते हैं इसके अलावा कैथ लैब स्टाफ की सैलरी, महंगी कैथ लैब (एक से तीन करोड़), रखरखाव, लगातार चलती बिजली, एसी-जेनरेटर, अनेक लाइसेंसो की फीस इत्यादि ना दिखने वाले खर्चों की वजह से प्राइवेट में कैथ लैब चलाना आसान नहीं ।

डॉ अनुभव सिंघल ,

एमडी मेडिसिन (गोल्ड-मेडल)

डीएम कार्डियोलॉजी (एसजीपीजीआई, लखनऊ)

 

 

 

 

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