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डेंगू से क्यों मरते हैं लोग ?.डेंगू का इलाज क्या है ?-बता रहे है-डॉ अनुभव सिंघल

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मुजफ्फरनगर। पूरे साउथ ईस्ट एशिया मे पोस्ट मॉनसून सीज़न(लेट अगस्त से मिड दिसंबर)हर साल शहरी इलाकों में ‘एडीज़ मच्छर’ के काटने से बहुत बडे स्तर पर(कुंभ मेले की भीड की तरह) फैलने वाला वायरल बुखार है।डेंगू के लक्षण क्या होते हैं?
5 दिन तक तेज बुखार, बदन दर्द, सिर दर्द, आंखों में दर्द, शरीर टूटना एवं बहुत कमजोरी आ जाती है। इसके बाद बुखार खत्म हो जाता है और शरीर पर (पेट, हाथों, पैरों)पिन की नोक जितने लाल धब्बे(रैश) निकलते हैं जो अगले 3-4दिन में ठीक हो जाते हैं।

प्लेटलेट्स का क्या चक्कर है?
बुखार उतरने के बाद (जब रैश निकलते हैं), खून में प्लेट्लेट की संख्या कम होनी शुरू हो जाती है जो अगले 3-4 दिन मे न्यूनतम स्तर पर आ जाती हैं (नॉरमल प्लेट्लेट डेढ से 4लाख होती हैं जो कम होकर 40 से 50 हजार एवं कभी-कभी तो 8 -10हजार पहुंच जाती हैं) इसके बाद खुद-ब-खुद अगले 3-4दिन मे तेजी से बढ कर नॉर्मल हो जाती हैं।

कम प्लेटलेट्स से क्या खतरा?
प्लेट्लेट्स का काम खून को जमाना होता है, डेंगू मे इनकी संख्या मे कमी के साथ-साथ क्वालिटी मे भी खराबी से,शरीर के अंदर खून रिसने का खतरा बन जाता है। परन्तु बहुत बड़ी संख्या में फैलने के बावजूद इस बुखार से ब्लीडिंग एवं जान का खतरा ना के बराबर होता है।

डेंगू से क्यों मरते हैं लोग ??
ऐसे बुखार-बदन दर्द मे ज्यादातर लोग खुद ही या छोटे-मोटे डॉक्टरों की सलाह से दर्द की गोलियां(जैसे-डिस्प्रिन, ब्रुफैन, कोम्बिफ्लैम, वोवरोन, नाइस, फ्लेक्सौन,मैफटाल) खा लेते हैं। क्योंकि पेनकिलर पेट में अल्सर बना सकती हैं,जिससे मामुली सा ब्लीडिंग का खतरा कईं गुना बढ़ जाता है एवं आंतों के अंदर ब्लीडिंग से मरीज की मृत्यु हो जाती है। परंतु टीवी/अखबार मे इसे ब्रेकिंग न्यूज़ बनाकर, डेंगू से मरने वालों की संख्या में गिना जाता है, जबकि मारा डेंगू जैसे निरीह, खुद ही सही होने वाले बुखार ने नहीं, बल्कि दर्द की गोलियों ने।इस तरह डेंगू का डर पब्लिक मे ‘हैरीपोरटर’ के विलेन ‘वोल्डेमोट’ की तरह फैलता है।बहुत बडी संख्या(करोड़ों मे)होने वाले इस बुखार के मौसम मे डॉक्टर (फिजिशियन), अस्पताल और पैथोलॉजी लैब्स भी दिवाली पर मिठाई की दुकान की तरह बदहवास बिज़ी रहते हैं।क्या टेस्ट कराएं?
खून में डेंगू टेस्ट(आईजीएम/आईजीजी बुखार शुरू होने के तीन-चार दिन में एवं एनएस-1 एन्टीजन तुरन्त) पॉजिटिव आना शुरू हो जाते हैं।परन्तु कईं बार लैब टैस्ट रिपोर्ट सही नही होती इसलिए टैस्ट पॉजिटिव नहीं भी आए तब भी इस तरह के बुखार को डेंगू मानकर ही इलाज करते हैं। सही बात तो यह है कि इस मौसम में होने वाले लगभग सभी बुखार डेंगू ही होते हैं।

हर लैब मे अलग रिपोर्ट क्यूं?
प्लेटलेट की रिपोर्टिंग – सैंपल कलेक्शन के तरीके, सैंपल की जांच तक पहुंचने में लगे समय एवं सैंपल जांचने वाले डॉक्टर की दक्षता के ऊपर निर्भर करती है इसलिए एक लैब में प्लेट्लेट चालीस हजार आती है तो दूसरी लैब में साढ़ हजार ।

प्लेटलेट्स चढ़ाएं या नही?
पहली बात तो 99% केस में प्लेटलेट की संख्या खुद ब खुद ही बढ़ जाती है। दूसरा डेंगू में प्लेट्लेट्स की संख्या कम होने के के साथ,क्वालिटी का भी डिफैक्ट होता है है, इसलिए प्लेटलेट्स नार्मल भी है तो यह मतलब नहीं कि ब्लीडिंग रिस्क नहीं है।इसलिए इलाज मरीज की कंडीशन को देखकर होता है केवल रिपोर्ट देखकर नहीं। तीसरा एक ‘रैंडम डोनर’ बैग (कीमत-पांच सौ) चढवाने से संख्या अधिक्तम केवल 5 हज़ार तक एवं ‘सिंगल डोनर'(‘एसडी’ या ‘जम्बो पैक’-कीमत बारह हजार) से अधिक्तम बीस हज़ार तक ही बढ़ पाती है। परंतु मीडिया द्वारा फैलाए टैरर की वजह से रिश्तेदार धैर्य न रखकर प्लेटलेट चढवाने की रट लगाते हैं(डेंगू पैनिक सिंड्रोम) जिसके प्रैशर मे डॉ भी प्लेटलेट चढ़वाने की सलाह देते हैं।

कब प्लेटलेट चढ़वाए ?
जब मरीज की प्लेटलेट बहुत कम(दस-पंद्रह हज़ार के नीचे) होने के साथ-साथ ब्लीडिंग टेंडेंसी लगे तब डॉक्टर की सलाह से प्लेटलेट चढवानी चाहिए !

डेंगू का इलाज क्या है?
99% केस में डैंगू बुखार खुद-ब-खुद 5 से 10 दिन में ठीक हो जाते हैं! इस दौरान आराम करना चाहिए, तरल पदार्थ प्रचुर मात्रा में लेने चाहिए, बुखार के लिए पैरासिटामोल(डोलो,कालपोल, क्रोसिन)लेनी चाहिए! पेनकिलर एवं ‘डिस्प्रिन’ कतई नहीं लेनी चाहिए। रोज-रोज पैथोलॉजी लैब जाकर प्लेटलेट की जांच (प्लेटलेट रिपोर्ट चेसिंग) नहीं करानी चाहिए वरना अनावश्यक एंग्जाइटी/टैंशन होती है। मच्छरों के पलने एवं काटने से बचाव के उपाय करने चाहिए। योग्य डॉक्टर के संपर्क में रहना चाहिए।

डॉ अनुभव सिंघल
एमडी मेडिसिन (गोल्ड मेडल),
डीएम कार्डियोलॉजी, एसजीपीजीआई लखनऊ

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