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क्यो किया जाता है ईको ?.क्या पता चलता है ईको से-बता रहे है-डीएम कार्डियो डा.अनुभव सिंहल

मुजफ्फरनगर। धड़कते दिल को अल्ट्रासाउंड वाली मशीन से विशेष प्रोब द्वारा कंप्यूटर स्क्रीन पर देखना/ रिकॉर्ड करना ‘टू-डी ई्को’ कहलाता है। इसी ईको मशीन से हार्ट के अंदर खून के फ्लो को देखना कलर-डॉप्लर कहलाता है। कई बार इसे 2D ईको एंड कलर डॉप्लर भी कहा जाता है।

ईको से क्या पता चलता है?

दिल का साइज, जैसे कि दिल फैला तो नहीं है(कार्डियोमगेली)  दिल की पंपिंग पावर कितनी है (कितना इजेक्शन फ्रेक्शन-ईएफ है), दिल के चारों तरफ पानी तो नहीं भरा है (पेरिकार्डियल इफ्यूज़न), बच्चों में दिल के छेद देखने के लिए, जानने के लिए कि पहले  हार्ट अटैक तो नहीं पड़ा है – जिससे दिल का कोई पार्ट कम चल रहा हो (आर डब्लू एम ए) , पुराना बीपी तो नहीं है(एलवीएच), दिल का वाल्व लीकेज तो नहीं है (रिगरजिटेशंन- एमआर/एआर), कोई वाल्व सिकुडा तो नही है (माइट्रल/अयोरटिक स्टिनोसिस), कई बार बीड़ी पीने से होने वाले दमा की वजह से दाएं तरफ के दिल पर पड़ने वाले प्रेशर की स्थिति जानने के लिए एवं फेफड़ों में खून के थक्के का शक होने पर (पल्मोनरी एंम्बॉलिज्म), ईको टेस्ट किया जाता है।

ईको कैसे किया जाता है?

मरीज को टेबल पर बायीं करवट लिटाया जाता है, बायीं तरफ की छाती का कपडा थोड़ा ऊपर उठा कर, एक प्रोब, थोड़ी जेली लगाकर अल्ट्रासाउंड की तरह थोड़ा इधर उधर छाती पर घुमाया जाता है एवं ईको मशीन पर कुछ बटन दबाकर, स्क्रीन पर रिकॉर्डिंग सेव कर ली जाती है। कॉर्डियोलॉजिस्ट को तो इसमें 10 मिनट से भी कम समय लगाता है।स्ट्रैस ईको क्या है?

जिन लोगों का घुटने में दर्द (गठिया) या रेस्टिंग ईसीजी में गड़बड़ी की वजह से टीएमटी नहीं किया जा सकता उन मरीजों की हाथ की नस में धड़कन बढ़ाने वाली दवा(डोब्यूटामीन) का इंजेक्शन चलाकर मरीज के तेज़ धड़कते हुए दिल का ईको व ईसीजी किया किया जाता है।टैस्ट के दौरान धीरे-धीरे दवा की डोज़ बढ़ाकर, हार्ट रेट को और बढ़ा कर, दिल पर और ज्यादा स्ट्रेस डाला जाता है। अगर इस स्ट्रेसफुल स्थिति में ईको/ईसीजी में चेंजे़ज़ डवलप होते हैं तो टेस्ट पॉजिटिव माना जाता है, मतलब के दिल की नसों में ब्लॉकेज हो सकती है। परंतु यह टेस्ट करने/ईको देखने वाले डॉक्टरकी दक्षता पर निर्भर होने के कारण कई बार गलत पॉजिटिव/नेगेटिव रिपोर्ट भी हो जाता है।

मुँह में नली डाल कर ईको क्या है?

कभी कभी ईको मुंह में दूरबीन की तरह नली डालकर भी किया जाता है जिसे टीईई (ट्रांस-ईसोफीजियल-ईको) कहा जाता है। इस प्रकार का ईको लम्बे बुखार का कारण पता लगाने (इन्फैक्टिव एन्डोकारडाइटिस का वैजिटेशन) एवं दिल मे छेद (एएसडी), वाल्व की सिकुड़न (माइट्रल-स्टिनोसिस(एमएस) ) के इलाज की प्लानिंग मे किया जाता है।ईको कराने मे क्या ध्यान रखें? ईको कराने के लिए खाली पेट की आवश्यक्ता नही होती।ईको कराने जांए तो ढीले-ढाले कपडे पहन कर जाना ठीक रहता है विशेषकर महिलाओं को। ईको जैसी बेहद जरुरी रिपोर्ट/फिल्म को मोबाइल इत्यादि पर सेव कर संभाल कर रखना चाहिए।ज्यादातर प्राइवेट सेन्टर्स मे ईको एक से डेढ़ हजार रुपये मे की जाती है। क्योंकि ईको की रिपोर्ट करने वाले डाक्टर की योग्यता पर निर्भर है इसलिए इस टैस्ट को कार्डियोलॉजिस्ट (डीएम-कार्डियोलॉजी) से कराना बेहतर रहता है।

डॉ अनुभव सिंघल एमडी, मेडिसिन (गोल्डमेडल)

डीएम, कार्डियोलॉजी (एसजीपीजीआई लखनऊ)

 

 

 

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