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युवराज सिंह, सन्यास एवं भारतीय क्रिकेट की पक्षपाती व्यवस्थाए।

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युवराज सिंह ने सन्यास ले लिया। 19 वर्षों के लंबे करियर के बाद जब खिलाड़ी 22 गज़ की पिच से खुद को अलग करता है, अपने दस्तानों को दीवार पर टांग देता है और अपने बल्ले की गर्जना थाम देता है, तो निश्चित तौर पर उस खिलाड़ी के जीवन के सर्वाधिक भावुक क्षणों में से एक वह क्षण होता है। परंतु एक क्रिकेट फैन के रूप में एक व्यक्ति के लिए भावुक होने का विषय होता हैं। उस खिलाड़ी द्वारा रचित इतिहास एवं इतिहास यूँ ही नही लिखे जाते।

25 जून 1932 को शुरू हुई भारतीय क्रिकेट की यह दास्तान अपने हर एक अध्याय में ना जाने कितने वीरों की गाथाएं समेटे हुए है। हर खिलाड़ी को एक ना एक दिन अपने खेल को अलविदा कहना ही पड़ता है, और ना जाने कितने खिलाड़ी हर दिन अपने करियर पर स्वेच्छा अथवा अनिच्छा से विराम लगा ही देते है। परंतु विरले होते है कुछ खिलाड़ी जिनके सन्यास की घोषणा भी देश विदेश के खेल प्रशंसकों के लिए महत्वपूर्ण घटना बन जाती है।

भारतीय क्रिकेट रुतबे और शोहरत का खेल है। यह क्रिकेट के उन पक्षों में से है जहां खिलाड़ी को भगवान का दर्जा भी दे दिया जाता है। सचिन तेंदुलकर जैसे एक विशिष्ट खिलाड़ी के लिए भारतीय क्रिकेट एवं प्रशंसकों ने सम्मान की समस्त परिभाषाओं तथा विशेषणो को पीछे छोड़ दिया है। क्रिकेट ही नही अपितु हर खेल में यदि कोई खिलाड़ी अतिविशिष्ट क्षमताओं का परिचय देता हुआ देश का नाम रोशन करता है, उस खेल में महत्वपूर्ण योगदान देता है, तो उसे इतना मानसम्मान मिलना सही है। इस देश ने युवराज सिंह को भी तहेदिल से प्यार दिया है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या इतने बड़े खिलाडी को विदाई क्रिकेट के मैदान से नही मिलनी चाहिए थी? भारतीय टीम की विशेष उपलब्धियों में अहम योगदान देने वाले इस क्रिकेटर के लिए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को कोई विशेष आयोजन कर अथवा एक अंतरराष्ट्रीय मैच में टीम में शामिल कर, मैदान से विदाई नही देनी चाहिए थी।

वास्तव में विश्व क्रिकेट में अपनी धाक चलाने वाले सर्वधिक अमीर क्रिकेट संस्थाओं में से एक बोर्ड वाले भारतीय क्रिकेट का यह काला सत्य है कि यहां ना जाने कितने ही महान खिलाड़ियों का सूर्य इस प्रकार अस्त हो गया है। मानों उनकी उम्र के साथ उनकी उपलब्धियां भी मद्धिम हो चली है। यह पहला अवसर नही है जब युवराज सिंह जैसे क्रिकेट के महान खिलाड़ी और जीवन के संघर्षों से वीर की भांति लड़ने वाले यौद्धा को इस प्रकार प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर खेल को अलविदा कहना पड़ा। अपितु गौतम गंभीर, वी.वी.एस. लक्ष्मण, वीरेंद्र सहवाग, इरफान पठान, मुनाफ पटेल जैसे खिलाड़ियों की एक लंबी फेहरिस्त है।

इस लेख को लिखते समय लेखक अतुल रघुवंशी का उद्देश्य मात्र यही है कि क्रिकेट को धर्म की तरह पूजने वाले इस देश के क्रिकेट प्रशासन कन क्रिकेट व्यवस्था पर एक प्रश्नचिन्ह लगा सकूं। क्योंकि भारतीय क्रिकेट को विश्व स्तर पर एक अग्रणी योग्यता दिलाने में ना केवल सचिन तेंदुलकर, सुनील गावस्कर, सौरव गांगुली, महेंद्र सिंह धोनी तथा विराट कोहली का योगदान है। परंतु हर उस क्रिकेटर का योगदान है। जिसने किसी ना किसी कालखंड में, किसी ने किसी रूप से अपना योगदान दिया और बात केवल सम्मानपूर्ण विदाई की नही है, बात पक्षपातपूर्ण टीम चयन की भी प्रतीत होती हैं।

क्या कारण रहा होगा कि गौतम गंभीर जैसे खिलाड़ी को जोकि भारत की विश्वकप विजयों का नायक रहा हैं। अपने करियर के शिखर पर टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है? क्या कारण है कि मुनाफ पटेल जैसा निम्नवर्गीय परिवार से आया एक गेंदबाज़ करियर के चरम पर अचानक से कहीं खो जाता है? क्या कारण रहा होगा कि वी.वी.एस. लक्ष्मण जैसा खिलाड़ी बीच श्रृंखला में अकस्मात ही सन्यास ले लेता है और क्या कारण रहा होगा कि अजिंक्या रहाणे जैसा श्रेष्ठ बल्लेबाज़ जिसने हाल ही में इंग्लिश कांउटी क्रिकेट के पर्दापण मैच में शतक बनाया, वह टीम चयन की की रेस का हिस्सा मात्र भी नही, निश्चित रूप से ये प्रश्न इस खेल की गरिमा पर प्रश्न उठाते है।

वैश्वीकरण के इस युग मे जबकि क्रिकेट जैसे खेल का पूर्ण रूप से व्यवसायिकरण हो चुका है, ऐसे प्रश्नों का उठना स्वाभाविक है। लेखक का दावा है कि लोढा कमेटी की सिफारिशों जैसे खेल की व्यवस्था में सुधार की परिकल्पना को बी.सी.सी.आई जैसी संस्था में अमलीजामा पहनाना आसान नही है। टीम चयन में पक्षपातपूर्ण रवैया भी जड़ से खत्म करने के लिए कप्तान एवं चयनकर्ताओं की नैतिकता एवं मूल्यतंत्र मजबूत होना चाहिए और ऐसा कहकर लेखक वर्तमान अथवा किसी अन्य कालखण्ड में तीन के चयनित क्रिकेटरों की क्षमताओं पर प्रश्नचिन्ह नही लगा रहा है। उनका चिंतन केवल इतना है कि यदि इस देश मे क्रिकेट का दर्जा इतना ऊंचा है और इस खेल में युवराज सिंह जैसे खिलाड़ियों ने अपना सर्वोच्च योगदान दिया है, तो फिर क्यूँ हम और क्रिकेट की सर्वोच्च संस्थाएं उन्हें खेल के मैदान से सम्मानपूर्वक विदाई नही दे पाते है?

देश के लिए खेलना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल प्रतिनिधित्व करना युवराज सिंह जैसे सैंकड़ो खिलाड़ियों के लिए निश्चित रूप से गर्व की बात होती होगी। परन्तु सन्यास की उद्घोषणा इस प्रकार होना भी एक मर्म का परिचायक है। खेल प्रशासकों को इस प्रकार की त्रुटिपूर्ण व्यवस्थाओं पर चिंतन अवश्य करना चाहिए।

लेखक- अतुल रघुवंशी
(व्यापर विश्लेषक एवं प्रशिक्षक न्यूक्लियस सॉफ्टवेयर एक्सपोर्टस लिमिटेड, नोएडा)

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